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वाराणसी में छाया खिचड़ी का खुमार, सज गया तिलकुट का बाजार
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Tue, 10 Jan 2017 11:45 PM IST
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शहर भर में जगह-जगह लगी दुकानें, पतंगों की बिक्री भी बढ़ी
- फोटो : अमर उजाला
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मकर संक्रांति पर्व को लेकर घर-घर तैयारियां शुरू हो गई हैं। 14 जनवरी को होने वाले लोक आस्था के पर्व को अब केवल तीन दिन ही बचे हैं।
इसे लेकर शहर भर में जगह-जगह तिलकुट, लाई, पट्टी आदि की दूकानें सज गई हैं।
वहीं घरों में भी ढुंढा, तिलवा आदि जोरशोर से बनाया जा रहा है। पतंगों की बिक्री भी बढ़ गई है।
मंडुवाडीह, विशेश्वरगंज, लहुराबीर सहित विभिन्न क्षेत्रों में दुकानदारों ने बताया कि इस बार गुड़, तिलकुट, लाई, पट्टी आदि के दाम स्थिर हैं।
इसके पीछे नोटबंदी को कारण बताया। मंडुवाडीह हनुमान मंदिर के सामने स्थित रामचंद गुप्ता और विशेश्वरगंज मंडी में थोक विक्रेता शीतल जायसवाल ने बताया कि नोटबंदी के चलते कच्चे माल के दाम में कमी आई थी।
इससे इस बार खाद्य सामग्रियों के दाम नहीं बढ़े हैं।
मकर संक्रांति पर्व पर भी अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है। अब बेटियों के यहां खिचड़ी भेजने की परंपरा में कमी आने लगी है।
गिने-चुने लोग रश्म निभा रहे हैं।
रेडीमेड तिलकुट, ढुंढा, पट्टी और लोगों की व्यवस्था के चलते परंपरा छूटती जा रही है।
जगतगंज की मंजू देवी ने बताया कि खिचड़ी भेजने की तैयारी एक पखवारे पूर्व ही शुरू हो जाती थी। गौराकला, चिरईगांव के चंद्र देव यादव ने बताया कि बिटिया के घर लोग सामर्थ्य के अनुसार गुड़ से बने खाद्य सामग्री, चावल, कपड़ा, फल आदि पहुंचाते थे।
इसका बेसब्री से इंतजार भी होता था। यह परंपरा धीरे-धीरे अब खत्म होती जा रही है।
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इसे लेकर शहर भर में जगह-जगह तिलकुट, लाई, पट्टी आदि की दूकानें सज गई हैं।
वहीं घरों में भी ढुंढा, तिलवा आदि जोरशोर से बनाया जा रहा है। पतंगों की बिक्री भी बढ़ गई है।
मंडुवाडीह, विशेश्वरगंज, लहुराबीर सहित विभिन्न क्षेत्रों में दुकानदारों ने बताया कि इस बार गुड़, तिलकुट, लाई, पट्टी आदि के दाम स्थिर हैं।
इसके पीछे नोटबंदी को कारण बताया। मंडुवाडीह हनुमान मंदिर के सामने स्थित रामचंद गुप्ता और विशेश्वरगंज मंडी में थोक विक्रेता शीतल जायसवाल ने बताया कि नोटबंदी के चलते कच्चे माल के दाम में कमी आई थी।
इससे इस बार खाद्य सामग्रियों के दाम नहीं बढ़े हैं।
मकर संक्रांति पर्व पर भी अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है। अब बेटियों के यहां खिचड़ी भेजने की परंपरा में कमी आने लगी है।
गिने-चुने लोग रश्म निभा रहे हैं।
रेडीमेड तिलकुट, ढुंढा, पट्टी और लोगों की व्यवस्था के चलते परंपरा छूटती जा रही है।
जगतगंज की मंजू देवी ने बताया कि खिचड़ी भेजने की तैयारी एक पखवारे पूर्व ही शुरू हो जाती थी। गौराकला, चिरईगांव के चंद्र देव यादव ने बताया कि बिटिया के घर लोग सामर्थ्य के अनुसार गुड़ से बने खाद्य सामग्री, चावल, कपड़ा, फल आदि पहुंचाते थे।
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इसका बेसब्री से इंतजार भी होता था। यह परंपरा धीरे-धीरे अब खत्म होती जा रही है।