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इस अधिवक्ता ने नहीं हारा कोई केसः संस्कृत में देते हैं दलील, 1978 में लड़ा था पहला मुकदमा; मिल चुका है सम्मान
Sun, 14 Jul 2024 08:10 PM IST
अमन विश्वकर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Sun, 14 Jul 2024 08:10 PM IST
सार
Varanasi News: अधिवक्ता आचार्य श्यामजी उपाध्याय का संस्कृत को काफी गहरा जुड़ाव है। यही कारण है कि वे आज भी संस्कृत भाषा में ही अपनी दलीलें पेश करते हैं। उनका मूल मिर्जापुर है लेकिन वे काशी में ही रच-बस गए हैं। उन्होंने बताया कि वे सनातन और अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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अधिवक्ता आचार्य श्यामजी उपाध्याय।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अधिवक्ता आचार्य श्यामजी उपाध्याय 45 साल से संस्कृत भाषा में वकालत कर रहे हैं। यहां तक कि उनका वकालतनामा, शपथ पत्र और प्रार्थना पत्र भी सबकुछ संस्कृत में ही होता है। 1978 में उन्होंने पहला केस लड़ा था और तब से आज तक लगातार इसी भाषा दलीलें देते हैं।
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उनका कहना है कि न्यायाधीशों ने भी उन्हें सराहा और कभी भी उन्हें भाषा बदलने के लिए नहीं कहा। संस्कृत भाषा को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें संस्कृत मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
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अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय बताते हैं कि उनकी उम्र जब करीब 10 वर्ष थी। वह अपने पिताजी के साथ किसी काम कचहरी आए थे। वह संस्कृत के विद्धान थे।
कचहरी में उन्होंने अपने एक मित्र से कहा कि यहां कोई संस्कृत भाषा में काम नहीं करता है, यह कष्ट का विषय है। तभी मैंने सोच लिया कि अब संस्कृत का ही ज्ञान लूंगा और इसी भाषा में वकालत करूंगा। वह दावा करते हैं कि वह देश के इकलौते वकील हैं जो संस्कृत भाषा में मुकदमा लड़ रहे हैं।
1978 से अब तक उन्होंने हजारों मुकदमें लड़े, इसमें हत्या, डकैती और बलात्कार समेत कई धाराओं के मुकदमें रहे और सभी में विजय प्राप्त की। कहते हैं कि शुरु में हाल यह था कि जज के सामने अपनी बात रखना शुरु करते थे तो वह आश्चर्य में पड़ जाते थे।
वह उनसे सामान्य संवाद भी संस्कृत भाषा में करते थे, उन्होंने इस भाषा का सरलीकरण भी किया है। कहा कि कई बार न्यायधीशों ने कुछ समझना चाहा और उनके पास अनुवादक नहीं हुआ तो उन्होंने खुद भी हिंदी में अनुवाद कर उन्हें समझाया।
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कई वकीलों को संस्कृत में हस्ताक्षर करना सिखाया
अधिवक्ता आचार्य श्यामजी उपाध्याय।
- फोटो : अमर उजाला
अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय ने कचहरी में अधिवक्ताओं से भी अपील की, कि वह संस्कृत भाषा का प्रयोग करें। कुछ अधिक न कर सके तो अपने हस्ताक्षर ही संस्कृत में करना सीख लें। इसे उन्होंने अभियान के रूप में चलाया और कई अधिवक्ताओं संस्कृत में हस्ताक्षर करना सिखाया। वह कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि इस भाषा को और सम्मान मिले और युवा संस्कृत भाषा को सीखे।
चौकी पर ही स्थापित कर काशी विश्वनाथ
अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय जहां जिस चौकी पर बैठकर लोगों से बात करते हैं। उसी लकड़ी की चौकी पर उन्होंने शिवलिंग और नंदी को भी स्थापित कर दिया है। सुबह सबसे पहले आकर उन पर गंगाजल, बेलपत्र, फूल और धूप अर्पित करते हैं। उसके बाद आगे काम शुरु करते हैं।
कहते हैं कि पहले वह नियमित करीब 40 साल तक गंगा स्नान कर काशी विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद ही कोर्ट आते थे। पिछले कुछ सालों में स्थितियां ऐसी बनी कि रोजाना दर्शन नहीं कर पाते थे तो उन्होंने चौकी पर स्थापित कर दिए और इन्हें ही काशी विश्वनाथ मानकर पूजन शुरु कर दिया।
चौकी पर ही स्थापित कर काशी विश्वनाथ
अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय जहां जिस चौकी पर बैठकर लोगों से बात करते हैं। उसी लकड़ी की चौकी पर उन्होंने शिवलिंग और नंदी को भी स्थापित कर दिया है। सुबह सबसे पहले आकर उन पर गंगाजल, बेलपत्र, फूल और धूप अर्पित करते हैं। उसके बाद आगे काम शुरु करते हैं।
कहते हैं कि पहले वह नियमित करीब 40 साल तक गंगा स्नान कर काशी विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद ही कोर्ट आते थे। पिछले कुछ सालों में स्थितियां ऐसी बनी कि रोजाना दर्शन नहीं कर पाते थे तो उन्होंने चौकी पर स्थापित कर दिए और इन्हें ही काशी विश्वनाथ मानकर पूजन शुरु कर दिया।