तो बदल जाते कैंट विधान सभा के हालात
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जिले के सबसे अधिक मतदाताओं (लगभग चार लाख) वाले कैंट विधानसभा क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं भी सर्वाधिक हैं। कहीं मुहल्ले पेयजल संकट से जूझ रहे हैं तो कहीं लोगों की उम्मीद और नेताओं का आश्वासन जलभराव में डूबते-उतराते नजर आते हैं। पूरा क्षेत्र ध्वस्त सीवर व्यवस्था और टूटी-फूटी सड़कों का दंश झेलने को मजबूर है। यह स्थिति तब है, जब पिछले 26 साल से इस सीट पर एक ही पार्टी और परिवार का कब्जा रहा है। क्षेत्र में 90 हजार के लगभग मुस्लिम वोटर, ब्राह्मण 36 हजार, कायस्थ 35 हजार और बनिया 25 हजार के लगभग हैं।
रामनगर और बजरडीहा के लोग बड़ी मुश्किल से अपने विधायक का नाम-पता बता पाते हैं। क्षेत्र में होने वाले विकास कार्य कई सालों से लटके हुए हैं। रामनगर किले के सामने चाय की चुस्की ले रहे रामचरण सिंह गंगा पर निर्माणाधीन पुल की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि अगर प्रयास होता तो लोग चंद्रमा की सैर कर आते पर 12 सालों में यह पुल तैयार नहीं हो सका। कोई लक्षण भी नजर नहीं आ रहा है। रामनगर के और लोग भी कहते हैं कि बीएचयू और लंका जाने के लिए अभी लगभग आठ किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। पुल बनने पर यह दूरी दो किलोमीटर हो जाएगी। इसी प्रकार शहर में कैंट और महमूरगंज में निर्माणाधीन ओवरब्रिज भी बीरबल की खिचड़ी साबित हो रहे हैं।
वहीं सवा लाख मुस्लिम आबादी वाले बजरडीहा में विकास का नाम सुने भी अरसे बीत गए हैं। शकील अहमद ने बताया कि मुस्लिम बाहुल्य वाले इस क्षेत्र में न तो स्कूल, कॉलेज हैं और न ही अस्पताल। मदरसे शिक्षा की जरूरत पूरी कर रहे हैं। बताया कि सीवर और पानी को लेकर हर बार हाहाकार मचता है। डायरिया फैलना तो आम बात है। हमारी विधायक सालाना उर्स की तरह ही नजर आती हैं। दूसरी ओर सिगरा, महमूरगंज और लंका जैसे क्षेत्र खराब सड़कों के साथ-साथ अतिक्रमण और उससे उत्पन्न जाम की समस्या से कराहते रहते हैं।