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जयंती: बनारस घराने की नायाब हीरा थीं सितारा देवी, 16 साल की उम्र में टैगोर ने दिया था कथक क्वीन का खिताब

Mon, 08 Nov 2021 11:33 AM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: वाराणसी ब्यूरो Updated Mon, 08 Nov 2021 11:33 AM IST
सार

कथक साम्राज्ञी सितारा देवी की आज 101वीं जयंती है। बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिला। 

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The world knows Kashi's Dhanno by the name of Kathak Queen
सितारा देवी ने कथक को दुनिया भर में चमकाया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी की गलियों में रहने वाली धन्नो को आज पूरी दुनिया कथक क्वीन सितारा देवी के नाम से जानती है। कथक साम्राज्ञी ने दुनिया को कथक की बारीकियों से रूबरू कराया और विश्व फलक पर कथक को नई पहचान दिलाई। आठ नवंबर 1920 को बनारस के कबीरचौरा मोहल्ले में जन्मी धन्नो की जयंती का शताब्दी वर्ष पूर्ण हो चुका है और 101वीं जयंती आज मनाई जा रही है। 
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कथक साम्राज्ञी की बेटी जयंतीमाला मिश्रा ने बताया कि कथक साम्राज्ञी सितारा देवी को मात्र 16 साल की उम्र में ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उनका नृत्य देखकर उन्हें कथक क्वीन के खिताब से नवाजा था। आज से सौ साल पहले जब कोई यह सोच नहीं सकता था कि एक शरीफ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे।
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तब उस दौर में नाना आचार्य सुखदेव ने पहली बार परिवार की परंपरा तोड़ी। किसी रूढ़ि को तोड़कर कला साधना में लीन होने का इनाम उन्हें बिरादरी के बहिष्कार के रूप में मिला। बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिला। कला के क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए उन्होंने स्टेज शो करने का विचार किया और सन 1952 के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो पहली ऐसी नृत्यांगना थीं जो उस दौर में लंदन गईं।
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लगातार 12 घंटे नृत्य

उन्होंने देश-विदेश में ढेर सारे शो किए और कथक को एक अलग पहचान दिलाई। मुंबई के बिरला मातोश्री हॉल में बनाया गया रिकार्ड उनके जीवन की बेहतरीन पूंजी थी। उन्होंने वहां लगातार 12 घंटे नृत्य किया था।
वहीं उनके शिष्य व नाती विशाल कृष्णा ने बताया कि धन्नो से सितारा देवी बनने की कहानी के पीछे उनकी तपस्या, त्याग, समर्पण और गुस्सा भी था। चीन और रूस जैसे देशों से उन्हें नागरिकता का आमंत्रण भी मिला लेकिन उनको भारत और अपनी काशी से जो लगाव था उसने उन्हें कहीं नहीं जाने दिया।
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