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ऊर्जा के स्वामी से लोक मंगल की कामना
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 18 Nov 2015 02:08 AM IST
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लोक मंगल की भावना से भरे डाला षष्ठी व्रत के तहत अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए मंगलवार की शाम उत्तरवाहिनी गंगा तट पर आस्थावानों का सैलाब उमड़ पड़ा। गंगा का अर्धचंद्राकार तट पर व्रतियों और उनके साथ आए लोगों की शृंखला यादगार बन गई।
ढोल-नगाड़ों की थाप, शहनाई गूंज और आतिशबाजी के बीच व्रतियों ने अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया। बुधवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण होगा। सूर्य को अर्घ्यदान के लिए दोपहर बाद से ही महिलाओं के समूह छठ माता के गीत गाते हुए घरों से निकलने लगे।
सिर पर दउरा (डाला) में पूजा सामग्री लेकर व्रतियों के पति, पुत्र या भाई साथ चल रहे थे। हर तरफ बाजेगाजे के साथ इसी अंदाज में महिलाओं की भीड़ गंगा तटों, सरोवरों की ओर बढ़ती नजर आई। मनौती मानने वाली कुछ महिलाएं साष्टांग दंडवत होते हुए घाटों तक पहुंची।
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तमाम लोग पुण्य अर्जित करने के लिए ऐसे व्रतियों के आगे की धूल बटोरते रहे। शाम चार बजे तक दशाश्वमेध, राजेंद्र प्रसाद, शीतला घाट, मान मंदिर, पांडेय घाट, चौकी घाट, केदार घाट, हनुमान घाट, शिवाला घाट, अस्सी से नगवा, सामने घाट, मदरवा और विश्व सुंदरी पुल तक खचाखच भीड़ उमड़ पड़ी।
राजघाट, प्रह्लाद घाट पर चंदौली के बलुआ, सराय मोहाना, सूजाबाद, डोमरी तक के लोग पहुंचे। स्नान के बाद नाक से लेकर मांग तक सिंदूर लगाकर व्रती महिलाएं घुटने तक गंगा जल में खड़ी होकर भगवान भास्कर की आराधना में जुटी रहीं।
गन्ने के मंडप सजाकर और वेदियों पर कलश रखकर घी के दीए जलाकर व्रतियों ने नइहर से ससुराल तक के मंगल की कामना की। सूप में केला, सेब, कच्ची हल्दी, संतरा के साथ ठेकुआ और अन्य पकवान षष्ठी माता को अर्पित किए गए।
शाम 5:23 पर जैसे ही सूर्यास्त का समय आया, हर हर महादेव के जयकारे के साथ अर्घ्य देने का सिलसिला शुरू हो गया। पतियों, पुत्रों ने गंगा जल में खड़ीं व्रतियों को अर्घ्य दिलाया। इस दौरान हर तरफ षष्ठी माता की आराधना के गीत गूंजते रहे।
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ढोल-नगाड़ों की थाप, शहनाई गूंज और आतिशबाजी के बीच व्रतियों ने अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया। बुधवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण होगा। सूर्य को अर्घ्यदान के लिए दोपहर बाद से ही महिलाओं के समूह छठ माता के गीत गाते हुए घरों से निकलने लगे।
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सिर पर दउरा (डाला) में पूजा सामग्री लेकर व्रतियों के पति, पुत्र या भाई साथ चल रहे थे। हर तरफ बाजेगाजे के साथ इसी अंदाज में महिलाओं की भीड़ गंगा तटों, सरोवरों की ओर बढ़ती नजर आई। मनौती मानने वाली कुछ महिलाएं साष्टांग दंडवत होते हुए घाटों तक पहुंची।
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तमाम लोग पुण्य अर्जित करने के लिए ऐसे व्रतियों के आगे की धूल बटोरते रहे। शाम चार बजे तक दशाश्वमेध, राजेंद्र प्रसाद, शीतला घाट, मान मंदिर, पांडेय घाट, चौकी घाट, केदार घाट, हनुमान घाट, शिवाला घाट, अस्सी से नगवा, सामने घाट, मदरवा और विश्व सुंदरी पुल तक खचाखच भीड़ उमड़ पड़ी।
राजघाट, प्रह्लाद घाट पर चंदौली के बलुआ, सराय मोहाना, सूजाबाद, डोमरी तक के लोग पहुंचे। स्नान के बाद नाक से लेकर मांग तक सिंदूर लगाकर व्रती महिलाएं घुटने तक गंगा जल में खड़ी होकर भगवान भास्कर की आराधना में जुटी रहीं।
गन्ने के मंडप सजाकर और वेदियों पर कलश रखकर घी के दीए जलाकर व्रतियों ने नइहर से ससुराल तक के मंगल की कामना की। सूप में केला, सेब, कच्ची हल्दी, संतरा के साथ ठेकुआ और अन्य पकवान षष्ठी माता को अर्पित किए गए।
शाम 5:23 पर जैसे ही सूर्यास्त का समय आया, हर हर महादेव के जयकारे के साथ अर्घ्य देने का सिलसिला शुरू हो गया। पतियों, पुत्रों ने गंगा जल में खड़ीं व्रतियों को अर्घ्य दिलाया। इस दौरान हर तरफ षष्ठी माता की आराधना के गीत गूंजते रहे।