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अफसर अभी से तलाशने लगे देरी के बहाने
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 06 Apr 2017 01:37 AM IST
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रिंग रोड
- फोटो : Demo Pic.
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के विकास की कुछ चुनिंदा योजनाओं को 30 जून तक पूरा करने के निर्देश दिए हैं। विकास के अन्य कार्यों की गति तेज करने की हिदायत भी अधिकारियों को दी गई है। अधिकारियों ने हामी तो भरी ली है लेकिन काम के तय समय पर पूरा होने में संशय है। इसके लिए विभागीय अधिकारियों ने बहाने तलाशने शुरू कर दिए हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह से वह कार्रवाई की स्थिति आने पर से खुद को बचा पाएंगे।
सामने घाट गंगा पुल का निर्माण कार्य अधूरा है। इसे सेतु निगम को पूरा करना है। यहां पर छह प्रतिशत काम बचा है। मंडुवाडीह आरओबी का निर्माण कार्य भी लगभग पूरा है। रेलवे अपना काम पूरा कर दे तो इसे भी 30 जून तक पूरा किया जा सकता है। दूसरी ओर से कोनिया से सलापुर और फुलवरिया फ्लाईओवर का प्रस्ताव भेजा गया है। कोनिया के काम को भी तय समय पर पूरा किया जा सकता है। जिला प्रशासन, सेतु निगम और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि गरमी में मजदूर आसानी से नहीं मिलते हैं। पानी की समस्या होगी। निर्माण कार्य को पक्का होने से पहले शटरिंग खोली नहीं जा सकती है। इसके अलावा अधिकारी दो विभागों से जुड़े कामों में एक-दूसरे के पाले में फेंकने में भी जुट गए हैं।
इस बीच योगी के एक्शन मोड में आने के बाद कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने गुरुवार को विकास कार्योे से जुड़े विभागीय अधिकारियों, सेतु निगम और भूमि अध्याप्ति अधिकारी को दस्तावेजों के साथ तलब किया है। बैठक में सभी कामों की समीक्षा की जाएगी। निर्माणाधीन कार्यों पर विशेष फोकस रहेगा। रिंग रोड की बाधाएं दूर कर हर हाल में जल्द से जल्द काम शुरू कराना है। अब कमिश्नर हर सप्ताह निर्माणाधीन कार्यों की समीक्षा करेंगे। साथ ही नए प्रोजेक्ट पर भी पूरी तैयारी के साथ काम शुरू कराया जाएगा। लखनऊ में मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में शामिल होने के बाद कमिश्नर मंगलवार रात ही वाराणसी आ गए थे। उन्होंने बुधवार को डीएम योगेश्वर राम मिश्र के साथ बैठक में तय हुए बिंदुओं पर चर्चा की।
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793 करोड़ की सीवेज योजना जल निगम और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की कछुआ चाल से काम आठ साल बाद भी अधूरा है। इसे तीन साल पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था।
2009 में सीवेज पाइप लाइन, पंपिंग स्टेशन, स्टार्म ड्रेनेज वाटर (बरसाती पानी की निकासी) और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम शुरू हुआ लेकिन कार्यदायी संस्थाओं की उदासीनता के चलते अब तक सिर्फ सीवेज पाइप लाइन और स्टार्म ड्रेनेज वाटर का काम जैसे-तैसे पूरा तो हो पाया है। सीवेज प्लांट अब तक नहीं बनने से पाइप बिछाने का लाभ शहरियों को नहीं मिल सका है। सीवेज अब भी गंगा में गिर रहा है।
जेएनएनयूआरएम के तहत सीवेज गोइठहां में नए 120 और दीनापुर में 140 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का विस्तार कराया जा रहा है। दोनों प्लांट का निर्माण कार्य इसी मार्च तक पूरा होना था लेकिन जल निगम और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की सुस्त चाल से काम अब तक 50 फीसदी भी पूरा नहीं हो पाया है। वहीं अस्सी से राजघाट तक शाही नाले, इसके अलावा चौकाघाट, कोनिया और नगवा में सीवेज पंपिंग स्टेशन का कार्य भी अधूरा है। रमना में बनने वाले 50 एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण की शुरूआत ही नहीं हो सकी है।
करोड़ों की पेयजल योजना पूरी न होने और कामों की गुणवत्ता की टीएसी जांच कराने के फैसले के बाद जल निगम के अधिकारी लीपापोती करने में जुट गए हैं। नौ साल में पांच सौ करोड़ से अधिक खर्च हो गए लेकिन घरों तक पानी अब तक नहीं पहुंच पाया है। इस गर्मी में भी पानी के लिए शहर के नागरिकों को तरसना होगा और हाय-तौबा मचना तय है। टीएसी की जांच में भ्रष्टाचार का बड़ा खेल सामने आ सकता है।
2008 में जेएनएनयूआरएम के तहत शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के लिए 518.66 करोड़ रुपये की योजना पुराने बनारस और ट्रांस वरुणा में शुरू हुई थी। दो बार योजना की मियाद बढ़ाई जा चुकी है। इसकेबाद भी काम अधूरा है। मानकों की अनदेखी और भ्रष्टाचार का हाल यह है कि ओवरहेड टैंक से आपूर्ति कर टेस्टिंग कराई जा रही है तो जगह-जगह पाइप लाइन फट जा रही है। इसके चलते शहर में बने करीब 40 ओवरहेड टैंक में से सिर्फ 16 को ही जलकल विभाग को हैंडओवर किया जा सका है। अभी हाल ही में टेस्टिंग के दौरान सारनाथ चौराहे पर पेयजल पाइप फट गई और सड़क पर पानी भर गया। वहीं सारनाथ में बनने वाला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण भी नहीं शुरू हो पाया है। इसके चलते वरुणापार में तो योजना अधर में है। मामला कोर्ट तक पहुंच गया है। ऐसे में वरुणापार की तकरीबन पांच लाख से अधिक की आबादी को इस गर्मी में तो दूर अभी कई साल तक भरपूर पानी मिलने की उम्मीद नहीं है।
रिंग रोड के कार्य में तेजी लाने के लिए मुख्यमंत्री की सख्त हिदायत के बावजूद प्रशासन की सुस्ती बरकरार है। अभी तक मुआवजा बांटने के लिए गांवों की सूची तक नहीं बन पाई है। आला अफसरों ने चाहा तो मुआवजा बांटने के बाद काम शुरू हो गया होता। फिलहाल इस प्रोजेक्ट में जमीन अधिग्रहण के बदले में 1600 किसानों को एक करोड़ 85 लाख रुपये का मुआवजा बांटा जाना है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद रिंग रोड की जद में आने वाले14 गांवों में मुआवजा बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई पर अभी तक रफ्तार नही पकड़ पाई है। एसएलओ कार्यालय पर मुआवजे की प्रक्रिया के बारे में भी किसान अनभिज्ञ हैं। एसएलओ कार्यालय में स्टॉफ की कमी का हवाला दिया जा रहा है। मुख्य भूमि अध्याप्ति अधिकारी राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि जल्द से जल्द सभी किसानों को मुआवजा दे दिया जाएगा। अभी तक दो-तीन गांवों में ही कैंप लगाए जा सके हैं। गोइठहां में कैंप लगाकर गुरुवार को मुआवजा वितरित किया जाएगा। वहीं जिला मुख्यालय पर भी किसान मुआवजा लेने के लिए जरूरी कागजात जमा करा रहे हैं। कुछ गांवों में रिंग रोड के प्रभावित किसानों के बैंक खाते में अभी तक मुआवजा राशि नही पहुंची हैं जबकि उन्होंने कागजात जमा करा दिए हैं। अधिकारियों का दावा है कि चार से पांच दिन में सभी का भुगतान कर दिया जा रहा है। 2003 में केंद्र में अटल बिहारी वायपेयी सरकार में रिंग रोड निर्माण की योजना बनाई गई थी। केंद्र में तत्कालीन मंत्री राजनाथ सिंह की इसमें अहम भूमिका थी। इस प्रोजेक्ट के लिए सबसे पहने 2003 में नोटिफिकेशन जारी हुआ और 2004 में आठ गांव के किसानों मुआवजा देकर जमीन का अभिग्रहण किया गया। 14 गांवों के किसानों को मुआवजा नहीं दिया जा सका था। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद फिर से जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई।
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सामने घाट गंगा पुल का निर्माण कार्य अधूरा है। इसे सेतु निगम को पूरा करना है। यहां पर छह प्रतिशत काम बचा है। मंडुवाडीह आरओबी का निर्माण कार्य भी लगभग पूरा है। रेलवे अपना काम पूरा कर दे तो इसे भी 30 जून तक पूरा किया जा सकता है। दूसरी ओर से कोनिया से सलापुर और फुलवरिया फ्लाईओवर का प्रस्ताव भेजा गया है। कोनिया के काम को भी तय समय पर पूरा किया जा सकता है। जिला प्रशासन, सेतु निगम और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि गरमी में मजदूर आसानी से नहीं मिलते हैं। पानी की समस्या होगी। निर्माण कार्य को पक्का होने से पहले शटरिंग खोली नहीं जा सकती है। इसके अलावा अधिकारी दो विभागों से जुड़े कामों में एक-दूसरे के पाले में फेंकने में भी जुट गए हैं।
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इस बीच योगी के एक्शन मोड में आने के बाद कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने गुरुवार को विकास कार्योे से जुड़े विभागीय अधिकारियों, सेतु निगम और भूमि अध्याप्ति अधिकारी को दस्तावेजों के साथ तलब किया है। बैठक में सभी कामों की समीक्षा की जाएगी। निर्माणाधीन कार्यों पर विशेष फोकस रहेगा। रिंग रोड की बाधाएं दूर कर हर हाल में जल्द से जल्द काम शुरू कराना है। अब कमिश्नर हर सप्ताह निर्माणाधीन कार्यों की समीक्षा करेंगे। साथ ही नए प्रोजेक्ट पर भी पूरी तैयारी के साथ काम शुरू कराया जाएगा। लखनऊ में मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में शामिल होने के बाद कमिश्नर मंगलवार रात ही वाराणसी आ गए थे। उन्होंने बुधवार को डीएम योगेश्वर राम मिश्र के साथ बैठक में तय हुए बिंदुओं पर चर्चा की।
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793 करोड़ की सीवेज योजना जल निगम और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की कछुआ चाल से काम आठ साल बाद भी अधूरा है। इसे तीन साल पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था।
2009 में सीवेज पाइप लाइन, पंपिंग स्टेशन, स्टार्म ड्रेनेज वाटर (बरसाती पानी की निकासी) और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम शुरू हुआ लेकिन कार्यदायी संस्थाओं की उदासीनता के चलते अब तक सिर्फ सीवेज पाइप लाइन और स्टार्म ड्रेनेज वाटर का काम जैसे-तैसे पूरा तो हो पाया है। सीवेज प्लांट अब तक नहीं बनने से पाइप बिछाने का लाभ शहरियों को नहीं मिल सका है। सीवेज अब भी गंगा में गिर रहा है।
जेएनएनयूआरएम के तहत सीवेज गोइठहां में नए 120 और दीनापुर में 140 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का विस्तार कराया जा रहा है। दोनों प्लांट का निर्माण कार्य इसी मार्च तक पूरा होना था लेकिन जल निगम और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की सुस्त चाल से काम अब तक 50 फीसदी भी पूरा नहीं हो पाया है। वहीं अस्सी से राजघाट तक शाही नाले, इसके अलावा चौकाघाट, कोनिया और नगवा में सीवेज पंपिंग स्टेशन का कार्य भी अधूरा है। रमना में बनने वाले 50 एमएलडी का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण की शुरूआत ही नहीं हो सकी है।
करोड़ों की पेयजल योजना पूरी न होने और कामों की गुणवत्ता की टीएसी जांच कराने के फैसले के बाद जल निगम के अधिकारी लीपापोती करने में जुट गए हैं। नौ साल में पांच सौ करोड़ से अधिक खर्च हो गए लेकिन घरों तक पानी अब तक नहीं पहुंच पाया है। इस गर्मी में भी पानी के लिए शहर के नागरिकों को तरसना होगा और हाय-तौबा मचना तय है। टीएसी की जांच में भ्रष्टाचार का बड़ा खेल सामने आ सकता है।
2008 में जेएनएनयूआरएम के तहत शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के लिए 518.66 करोड़ रुपये की योजना पुराने बनारस और ट्रांस वरुणा में शुरू हुई थी। दो बार योजना की मियाद बढ़ाई जा चुकी है। इसकेबाद भी काम अधूरा है। मानकों की अनदेखी और भ्रष्टाचार का हाल यह है कि ओवरहेड टैंक से आपूर्ति कर टेस्टिंग कराई जा रही है तो जगह-जगह पाइप लाइन फट जा रही है। इसके चलते शहर में बने करीब 40 ओवरहेड टैंक में से सिर्फ 16 को ही जलकल विभाग को हैंडओवर किया जा सका है। अभी हाल ही में टेस्टिंग के दौरान सारनाथ चौराहे पर पेयजल पाइप फट गई और सड़क पर पानी भर गया। वहीं सारनाथ में बनने वाला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण भी नहीं शुरू हो पाया है। इसके चलते वरुणापार में तो योजना अधर में है। मामला कोर्ट तक पहुंच गया है। ऐसे में वरुणापार की तकरीबन पांच लाख से अधिक की आबादी को इस गर्मी में तो दूर अभी कई साल तक भरपूर पानी मिलने की उम्मीद नहीं है।
रिंग रोड के कार्य में तेजी लाने के लिए मुख्यमंत्री की सख्त हिदायत के बावजूद प्रशासन की सुस्ती बरकरार है। अभी तक मुआवजा बांटने के लिए गांवों की सूची तक नहीं बन पाई है। आला अफसरों ने चाहा तो मुआवजा बांटने के बाद काम शुरू हो गया होता। फिलहाल इस प्रोजेक्ट में जमीन अधिग्रहण के बदले में 1600 किसानों को एक करोड़ 85 लाख रुपये का मुआवजा बांटा जाना है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद रिंग रोड की जद में आने वाले14 गांवों में मुआवजा बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई पर अभी तक रफ्तार नही पकड़ पाई है। एसएलओ कार्यालय पर मुआवजे की प्रक्रिया के बारे में भी किसान अनभिज्ञ हैं। एसएलओ कार्यालय में स्टॉफ की कमी का हवाला दिया जा रहा है। मुख्य भूमि अध्याप्ति अधिकारी राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि जल्द से जल्द सभी किसानों को मुआवजा दे दिया जाएगा। अभी तक दो-तीन गांवों में ही कैंप लगाए जा सके हैं। गोइठहां में कैंप लगाकर गुरुवार को मुआवजा वितरित किया जाएगा। वहीं जिला मुख्यालय पर भी किसान मुआवजा लेने के लिए जरूरी कागजात जमा करा रहे हैं। कुछ गांवों में रिंग रोड के प्रभावित किसानों के बैंक खाते में अभी तक मुआवजा राशि नही पहुंची हैं जबकि उन्होंने कागजात जमा करा दिए हैं। अधिकारियों का दावा है कि चार से पांच दिन में सभी का भुगतान कर दिया जा रहा है। 2003 में केंद्र में अटल बिहारी वायपेयी सरकार में रिंग रोड निर्माण की योजना बनाई गई थी। केंद्र में तत्कालीन मंत्री राजनाथ सिंह की इसमें अहम भूमिका थी। इस प्रोजेक्ट के लिए सबसे पहने 2003 में नोटिफिकेशन जारी हुआ और 2004 में आठ गांव के किसानों मुआवजा देकर जमीन का अभिग्रहण किया गया। 14 गांवों के किसानों को मुआवजा नहीं दिया जा सका था। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद फिर से जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई।