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बरसन लागी सावन बुंदिया तोरे बिन लगे नाहीं मोरा जिया...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 12 Jul 2016 01:50 AM IST
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जयंतीमाला
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आकाश में उमड़ते आषाढ़ के मेघ महाकवि कालिदास की कल्पना में उड़ान भर कर उनसे यक्ष के विरह के जरिए मेघदूतम् की अमर रचना करवा डालते हैं। मेघों की ओर निहार कर विरही यक्ष अपनी प्रियतमा के लिए यूं ही नहीं छटपटाने लगता। कुछ तो असहज कर देने वाली इन मेघों में जरूर होगी। तभी तो आज भी जब घटाएं घिरती हैं तो न जाने कितने, यक्ष-यक्षिणियों के दिल में विरह की घनीभूत पीड़ा छा जाती है। इस पीड़ा को, दिल के भीतर की तड़प को या तो बरसते मेघ मिटा सकते हैं या फिर मल्हार...। यह कहना है बनारस घराने की कथक क्वीन रहीं सितारा देवी की पुत्री जयंतीमाला का।
कथक नृत्यांगना जयंतीमाला आषाढ़ में मेघों की उमड़-घुमड़, बिजली की चमक को मेघदूतम के यक्ष की पीड़ा से जोड़ती हैं। वह कहती हैं कि बरखा बहार उन विरहिनियों के दिल को टीसती, सताती है जिनके प्रियतम परदेस में मेघों की मनिंद छाए होते हैं। प्रियतम का हर पल-छिन उन्हें इंतजार रहता है। तभी तो जब आषाढ़ के बादल पहाड़ी चोटियों के ऊपर से गुजरते हैं तब रात के समय अलकापुरी की कामिनियां लंबे-लंबे डग भरती हुई अपने प्रेमियों को ढूंढने लगती हैं। उस समय उनकी चोटियों में गुंथे हुए कल्पवृक्षों के फूल खिसक कर निकल जाते हैं। उनके कानों में लटकते कमलरूपी सोने के कुंडल गिर जाते हैं। हारों के टूटे हुए मोती बिखर जाते हैं। विरह की यह वेदना इस मौसम में यू्ं ही नहीं फूटती। वह कहती हैं कि मेघों की गरज-तरज का बिजली की चमक का या बारिश की बूंदों की अपनी लय है। घहराती घटाओं का अपना संगीत होता है। मल्हार के कवित्त और छंदों पर कथक की थिरकन बरिश की बूंदों का एहसास लेकर आती है। मेघों को देख मयूर यूं ही पंख पसारकर नहीं नाचने लगते। वह अपनी मां सितार देवी की प्रिय बंदिश सुनती हैं जिस पर वह अक्सर थिरकती थीं।
बरसन लागी सावन बुंदिया/तोरे बिन लगे नाहीं मोरा जिया..। जयंती माला एक घटना का जिक्र करते हुए बताती हैं कि वह करीब पांच वर्ष पहले बद्री केदार नाथ में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गई थीं। जून का महीना था। मल्हार की बंदिश पर बोल पढ़ंत शुरू हुआ। बोल थे-घिरि घेर घेर घहरत बादर/उठी घटा घनघोर/पवन मंद सुगंध डोलत/बरस रही चहुंओर...। कारे कारे बदरा घिरि -घिरि आवै/श्याम मोहन मोहें तड़पावें...के बोल पर में भावों को व्यक्त करने लगी। घुंघरू के माध्यम से वर्षा की बूंदों के धरती पर पड़ने एहसास पैदा होने लगा। बालों की लट, भौहों, पुतलियों के इशारों से बादलों और बिजली की तड़क-चमक के भाव लोगों को बरबस खींचने लगे। कुछ देर बाद इतनी बरिश होने लगी कि टेंट टूट गया। जून में बदरीनाथ की धरती जलमग्न हो गई। वह फिर नृत्य की अपनी पसंदीदा बंदिश सुनाती हैं जिसकी थिरकन पर कई बार घटाओं के घिरने का एहसस हो चुका है। कारी से बदरिया घिर-घिर आवे बरसावे नन्हीं नन्हीं बुंदिया/उमड़-घुमड़ घनघोर घटा छाए सूझे न मोहें डगरिया...। वह कहती हैं कि यह ऋतु प्रेम मिलन की है। बादर आएं और ‘वो’ न आएं तो विरहिन के दिल से ऐसे ही गीत निकलेंगे।
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कथक नृत्यांगना जयंतीमाला आषाढ़ में मेघों की उमड़-घुमड़, बिजली की चमक को मेघदूतम के यक्ष की पीड़ा से जोड़ती हैं। वह कहती हैं कि बरखा बहार उन विरहिनियों के दिल को टीसती, सताती है जिनके प्रियतम परदेस में मेघों की मनिंद छाए होते हैं। प्रियतम का हर पल-छिन उन्हें इंतजार रहता है। तभी तो जब आषाढ़ के बादल पहाड़ी चोटियों के ऊपर से गुजरते हैं तब रात के समय अलकापुरी की कामिनियां लंबे-लंबे डग भरती हुई अपने प्रेमियों को ढूंढने लगती हैं। उस समय उनकी चोटियों में गुंथे हुए कल्पवृक्षों के फूल खिसक कर निकल जाते हैं। उनके कानों में लटकते कमलरूपी सोने के कुंडल गिर जाते हैं। हारों के टूटे हुए मोती बिखर जाते हैं। विरह की यह वेदना इस मौसम में यू्ं ही नहीं फूटती। वह कहती हैं कि मेघों की गरज-तरज का बिजली की चमक का या बारिश की बूंदों की अपनी लय है। घहराती घटाओं का अपना संगीत होता है। मल्हार के कवित्त और छंदों पर कथक की थिरकन बरिश की बूंदों का एहसास लेकर आती है। मेघों को देख मयूर यूं ही पंख पसारकर नहीं नाचने लगते। वह अपनी मां सितार देवी की प्रिय बंदिश सुनती हैं जिस पर वह अक्सर थिरकती थीं।
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बरसन लागी सावन बुंदिया/तोरे बिन लगे नाहीं मोरा जिया..। जयंती माला एक घटना का जिक्र करते हुए बताती हैं कि वह करीब पांच वर्ष पहले बद्री केदार नाथ में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गई थीं। जून का महीना था। मल्हार की बंदिश पर बोल पढ़ंत शुरू हुआ। बोल थे-घिरि घेर घेर घहरत बादर/उठी घटा घनघोर/पवन मंद सुगंध डोलत/बरस रही चहुंओर...। कारे कारे बदरा घिरि -घिरि आवै/श्याम मोहन मोहें तड़पावें...के बोल पर में भावों को व्यक्त करने लगी। घुंघरू के माध्यम से वर्षा की बूंदों के धरती पर पड़ने एहसास पैदा होने लगा। बालों की लट, भौहों, पुतलियों के इशारों से बादलों और बिजली की तड़क-चमक के भाव लोगों को बरबस खींचने लगे। कुछ देर बाद इतनी बरिश होने लगी कि टेंट टूट गया। जून में बदरीनाथ की धरती जलमग्न हो गई। वह फिर नृत्य की अपनी पसंदीदा बंदिश सुनाती हैं जिसकी थिरकन पर कई बार घटाओं के घिरने का एहसस हो चुका है। कारी से बदरिया घिर-घिर आवे बरसावे नन्हीं नन्हीं बुंदिया/उमड़-घुमड़ घनघोर घटा छाए सूझे न मोहें डगरिया...। वह कहती हैं कि यह ऋतु प्रेम मिलन की है। बादर आएं और ‘वो’ न आएं तो विरहिन के दिल से ऐसे ही गीत निकलेंगे।
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