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‘सुबह-ए-बनारस’ बनाएगा सौ दिन का विश्व कीर्तिमान
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।
Updated Wed, 25 Feb 2015 01:23 AM IST
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काशी में ‘सुबह-ए-बनारस’ की महफिल हर रोज नए पन का अहसास कराने के साथ सौ दिन का सफर तय करने का विश्व कीर्तिमान बनाने की ओर है। बनारस घराने की धरती पर संगीत का यह अब तक का सबसे बड़ा उत्सव अपने 93 दिनों का सफर पूरा कर चुका है। इसकी हर सुबह को नए कलाकारों ने ही सुर, लय-ताल से सजाने में कामयाबी हासिल की है। संस्कृति विभाग की मानें तो वह दिन दूर नहीं जब ठेठ बनारसी अंदाज वाली सुबह-ए-बनारस की महफिल गिनीज बुक में दर्ज होगी। इसी के साथ ही सुबह के रागों पर आधारित सौ दिन तक नए कलाकारों के साथ शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति का काशी में अनूठा कीर्तिमान बनेगा।
पौ फटने के साथ गंगा की लहरों पर इठलाती सूर्य की किरणों की छटा सुबहे बनारस के रूप में अब रागों-बंदिशों की महफिल के साथ सोने पर सुहागा साबित होने लगी है। कभी जहां विदेशियों के लिए सुबहे बनारस नौका बिहार तक सीमित था, वहीं अब यह अपना नया विस्तार ले रहा है। पूरे मार्च की बुकिंग महीने भर पहले ही हो चुकी है। पहले इस महफिल के संयोजन से जुड़े लोगों को फिक्र थी कि इतने कलाकार आएंगे कहां से लेकिन हालत यह है कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, भोपाल से भी संगीत संस्थानों की ओर से कलाकारों की सूची भेजी जा रही है।
अमेरिका, जर्मनी, जापान के कलाकार भी सुबह-ए-बनारस की महफिल में हाजिरी लगाने के लिए फोन और मेल के जरिए संपर्क साध रहे हैं। अमेरिका में रहने वाली एनआरआई साधना मिश्र ने भी अपना बायोडाटा भेजा है लेकिन पहले से बुकिंग होने की वजह से मार्च महीने में उन्हें मौका नहीं मिल सका है। काशी में इस नए उत्सव को खड़ा करने का श्रेय डीएम प्रांजल यादव की पहल पर नए सिरे से अस्तित्व में आई जिला सांस्कृतिक समिति को जाता है। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने सूरज की लाली से सुबह के रागों को जोड़ने का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2012 में प्रदेश सरकार को भेजा था।
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रत्नेश बताते हैं कि उसके बाद कई बार फाइल दौड़ती रही लेकिन स्वीकृति नहीं मिल सकी। वर्ष 2014 में डीएम प्रांजल ने इस प्रस्ताव पर अमल करने का बीड़ा उठाया। नौ अक्तूबर को इसके लिए हुई पहली बैठक में डीएम ने जिले के आला अधिकारियों को इसके लिए सहयोग करने की अपील की और देखते-देखते शहर के संगीतकार, कलाकार और बुद्धिजीवी भी इससे जुड़ने लगे और अंतत: 24 नवंबर की सुबह पहली महफिल सजाने में कामयाबी मिल सकी। डॉ. रत्नेश वर्मा का कहना है कि अब सौ दिन का सफर पूरा होते ही सुबह के रागों पर एक ही समय में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति का यह विश्व का इकलौता कार्यक्रम बन जाएगा।
योजना और संसाधन
सुबहे बनारस की महफिल को कामयाब बनाने के लिए गठित क्षेत्रीय समिति ने अब तक अस्सी घाट पर इस आयोजन के लिए कुछ संसाधन भी आपसी सहयोग से जुटा लिया है, साथ ही लंबे समय तक इसे चलाने के लिए राग भी तैयार किए गए हैं।
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पौ फटने के साथ गंगा की लहरों पर इठलाती सूर्य की किरणों की छटा सुबहे बनारस के रूप में अब रागों-बंदिशों की महफिल के साथ सोने पर सुहागा साबित होने लगी है। कभी जहां विदेशियों के लिए सुबहे बनारस नौका बिहार तक सीमित था, वहीं अब यह अपना नया विस्तार ले रहा है। पूरे मार्च की बुकिंग महीने भर पहले ही हो चुकी है। पहले इस महफिल के संयोजन से जुड़े लोगों को फिक्र थी कि इतने कलाकार आएंगे कहां से लेकिन हालत यह है कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, भोपाल से भी संगीत संस्थानों की ओर से कलाकारों की सूची भेजी जा रही है।
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अमेरिका, जर्मनी, जापान के कलाकार भी सुबह-ए-बनारस की महफिल में हाजिरी लगाने के लिए फोन और मेल के जरिए संपर्क साध रहे हैं। अमेरिका में रहने वाली एनआरआई साधना मिश्र ने भी अपना बायोडाटा भेजा है लेकिन पहले से बुकिंग होने की वजह से मार्च महीने में उन्हें मौका नहीं मिल सका है। काशी में इस नए उत्सव को खड़ा करने का श्रेय डीएम प्रांजल यादव की पहल पर नए सिरे से अस्तित्व में आई जिला सांस्कृतिक समिति को जाता है। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने सूरज की लाली से सुबह के रागों को जोड़ने का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2012 में प्रदेश सरकार को भेजा था।
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रत्नेश बताते हैं कि उसके बाद कई बार फाइल दौड़ती रही लेकिन स्वीकृति नहीं मिल सकी। वर्ष 2014 में डीएम प्रांजल ने इस प्रस्ताव पर अमल करने का बीड़ा उठाया। नौ अक्तूबर को इसके लिए हुई पहली बैठक में डीएम ने जिले के आला अधिकारियों को इसके लिए सहयोग करने की अपील की और देखते-देखते शहर के संगीतकार, कलाकार और बुद्धिजीवी भी इससे जुड़ने लगे और अंतत: 24 नवंबर की सुबह पहली महफिल सजाने में कामयाबी मिल सकी। डॉ. रत्नेश वर्मा का कहना है कि अब सौ दिन का सफर पूरा होते ही सुबह के रागों पर एक ही समय में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति का यह विश्व का इकलौता कार्यक्रम बन जाएगा।
योजना और संसाधन
सुबहे बनारस की महफिल को कामयाब बनाने के लिए गठित क्षेत्रीय समिति ने अब तक अस्सी घाट पर इस आयोजन के लिए कुछ संसाधन भी आपसी सहयोग से जुटा लिया है, साथ ही लंबे समय तक इसे चलाने के लिए राग भी तैयार किए गए हैं।