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नाराज सेठ को ‘राजा’ कह लिया दान

Fri, 02 Sep 2016 02:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 02 Sep 2016 02:16 AM IST
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महामना पंडित मदन मोहन मालवीय बीएचयू की स्थापना के लिए जहां दान मांगने जाते, सभा करते। इससे पहले वहां के रईसों, सेठों की सूची तैयार की जाती थी। सभा में सभी को आमंत्रित किया जाता और फिर उनसे दान लिया जाता। इससे जुड़ा एक रोचक प्रसंग महामना की जन्मस्थली प्रयाग का है। विश्वविद्यालय के लिए दान एकत्र करने के उद्देश्य से संगम नगरी के सभी रईसों, धनाढ्य लोगों की सूची बनाई गई। उन्हें सभा के लिए आमंत्रित किया गया। सभा में सैकड़ों रईस आए और भाषण के बाद दिल खोलकर दान दिया।
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इस दौरान महामना को पता चला कि प्रयाग के एक रईस सेठ का नाम भूलवश सूची में शामिल नहीं किया। सेठ इससे नाराज हैं। सभा खत्म होते ही महामना सीधे सेठ के दरवाजे पर थे। सेठ ने उनको देखते ही मुंह फेर लिया, रूखा सा सवाल किया, ‘कहिए, कैसे आए पंडितजी!’। महामना को उनकी नाराजगी का पूरा भान था। तुरंत जवाब दिया कि विश्वविद्यालय के लिए चंदा लेने आया था। सेठ ने फौरन नाराजगी जता दी। बोले, कि रईसों की सूची से तो आप ने हमें बाहर कर दिया। ऐसे में भला मैं क्या दान दूं। मालवीय जी ने फौरन जवाब दिया, क्या रईसों की सूची में राजा का नाम शामिल करना शोभा देता है? आप राजा हैं। उस सूची में नाम देना आपकी प्रतिष्ठा को कमतर करना था। इतना सुनते ही सेठ गदगद हो गए। तुरंत ही नाराजगी दूर हो गई और महामना को 25 हजार रुपये दान दिया।
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इतना ही नहीं, सेठ ने विश्वविद्यालय परिसर में एक भवन बनाने का भी वायदा किया था। महामना की इस दान यात्रा में हिंदू मुस्लिम सभी शामिल हुए। ऐसी ही एक घटना है मुरादाबाद की। यहां मालवीय जी का व्याख्यान हुआ। व्याख्यान सुन एक सज्जन आंखों में आंसू और हाथ में पांच रुपये लिए हुए खड़े हुए और ले जाकर महामना के चरणों पर रख दिए और कहा, ‘मैं बहुत गरीब हूं, तब भी इस नेक काम में मैं पांच रुपये देता हूं’। यह देख सबकी आंखें डबडबा गईं। यही वजह थी कि उनकी झोली में पूरे भारत ने एक करोड़ रुपये की भीख डाल दी।
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मुजफ्फरपुर में ही एक गृहणी ने अपने सोने का कंगन बीएचयू के लिए दान में दिया था जो बाद में उनके पति ने दोगुने दाम पर वापस खरीद लिया था। बाद में वह कंगन फिर से विश्वविद्यालय के संग्रहालय को दे दिया गया। ऐसे ही कई अनमोल दान आज भी बीएचयू के भारत कला भवन में हैं जो उस वक्त विश्वविद्यालय के निर्माण की अमर कथा के प्रत्यक्ष गवाह हैं।



भूगोल विभाग, विज्ञान संस्थान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. राणा पीबी सिंह ने कहा कि ये महामना का संस्कार ही था कि उन्होंने इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया। उन्होंने यही प्रण लिया कि ये विश्वविद्यालय किसी एक व्यक्ति, किसी एक समाज का न होकर पूरे राष्ट्र का हो। महामना ने ये संप्रेषित किया कि ज्ञान की दीक्षा के लिए वही भिक्षा चाहिए जिससे व्यक्ति ही नहीं पूरा देश जुड़ जाए। महामना को एक वृद्धा ने एक रुपये का दान दिया जिसे महामना ने अपने जीवन का सबसे बहुमूल्य दान माना। एक रुपया दान देने के लिए उस वृद्धा ने दो दिन तक खाना नहीं खाया था। महामना को एक रुपये का दान देने के बाद उसकी मृत्यु हो गई थी। महामना ने ऐसी संवेदना जगाई थी लोगों में।
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