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Sankatmochan Sangeet Samaroh: मालिनी अवस्थी की ठुमरी, होरी का छाया जादू, बोलीं- 'इतिहास बनते देख रहे हैं'
Sun, 16 Apr 2023 02:41 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: किरन रौतेला
Updated Sun, 16 Apr 2023 02:41 PM IST
सार
संकटमोचन संगीत समारोह में तीसरी प्रस्तुति के रूप में संकट मोचन के दरबार में मालिनी अवस्थी ने छोटा ख्याल में एक बंदिश लंका जो धाय गये स्वामी को काज करैं... से गायन की शुरुआत की। इसके बाद राग माझ खमाज में ठुमरी जाग पड़ी मैं तो पीया के जगाने से... फिर इसी राग में दादरा तोहे लइ के संवरिया निकल चलबै... और बलम तोरे झगड़े में रैन गई... से गायन को विराम दिया।
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ठुमरी गायन प्रस्तुत करती मालिनी अवस्थी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
संकटमोचन संगीत समारोह के शताब्दी वर्ष हर मामले में बेहद अनूठा है। परंपरा के आंचल में समय के साथ कदमताल करते हुए सौंवे साल की छठवीं निशा में मालिनी अवस्थी ने अपनी प्रस्तुति पेश की।
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तीसरी प्रस्तुति के रूप में संकट मोचन के दरबार में मालिनी अवस्थी ने छोटा ख्याल में एक बंदिश लंका जो धाय गये स्वामी को काज करैं... से गायन की शुरुआत की। इसके बाद राग माझ खमाज में ठुमरी जाग पड़ी मैं तो पीया के जगाने से... फिर इसी राग में दादरा तोहे लइ के संवरिया निकल चलबै... और बलम तोरे झगड़े में रैन गई... से गायन को विराम दिया। उन्होंने दादरा, ठुमरी, होरी के साथ कई सुमधुर प्रस्तुतियां दीं। उनके साथ हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र और तबला पर लंदन निवासी बनारसी संजू सहाय ने प्रभावी संगत की।
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संकटमोचन संगीत समारोह में मालिनी अवस्थी
- फोटो : अमर उजाला
बोलीं मालिनी, बाबा के दरबार में आकर हो रही सुखद अनुभूति
संकटमोचन संगीत समारोह के शताब्दी समारोह में प्रस्तुति देने पहुंची मालिनी अवस्थी ने कहा कि बहुत ही सुखद अनुभूति है। हम अपनी आंखों के सामने एक इतिहास बनते देख रहे हैं और इसके सहभागी भी हैं। संकटमोचन के दरबार में होने वाला यह ऐतिहासिक उत्सव है। हम सभी के लिए यह बेहद गर्व की बात है।
मालिनी ने कहा कि पहले हम यहां श्रोता बनकर आते थे, बड़े-बड़े कलाकारों को सुनते रहे और फिर कलाकार के रूप में गा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यहां कोई भेद नहीं है। न गाने बजाने वालो में न सुनने वालों में हनुमान जी के दरबार में सब एक हैं। सुनने वाले को देखिए बड़ा से बड़ा छोटा सा छोटा जमीन पर बैठकर सुनता है। जो परंपरा है इस महोत्सव की वह आज भी कायम है। बड़े बड़े कलाकार यहां आकर अपने आप को धन्य मानते हैं। जो श्रोता हो हनुमान जी तो वहां का मंच प्रणम्य है हम लोगों के लिए। पूरे भारत वर्ष नहीं बल्कि पूरे विश्व में संकटमोचन शताब्दी समारोह जैसा भव्य आयोजन होना चाहिए। सब प्रकार के संगीतकारों की कलाकारों की यहां पर उपस्थिति है। सब बड़े मन से यहां आकर गाते हैं। ये सबसे बड़ी बात है इस मंच की बाकी जगह आप देखेंगे कि शास्त्रीय संगीत हैं या कहीं कहीं नृत्य नहीं होता। यहां पर ऐसा कोई भेद भाव नहीं है।
संकटमोचन संगीत समारोह के शताब्दी समारोह में प्रस्तुति देने पहुंची मालिनी अवस्थी ने कहा कि बहुत ही सुखद अनुभूति है। हम अपनी आंखों के सामने एक इतिहास बनते देख रहे हैं और इसके सहभागी भी हैं। संकटमोचन के दरबार में होने वाला यह ऐतिहासिक उत्सव है। हम सभी के लिए यह बेहद गर्व की बात है।
मालिनी ने कहा कि पहले हम यहां श्रोता बनकर आते थे, बड़े-बड़े कलाकारों को सुनते रहे और फिर कलाकार के रूप में गा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यहां कोई भेद नहीं है। न गाने बजाने वालो में न सुनने वालों में हनुमान जी के दरबार में सब एक हैं। सुनने वाले को देखिए बड़ा से बड़ा छोटा सा छोटा जमीन पर बैठकर सुनता है। जो परंपरा है इस महोत्सव की वह आज भी कायम है। बड़े बड़े कलाकार यहां आकर अपने आप को धन्य मानते हैं। जो श्रोता हो हनुमान जी तो वहां का मंच प्रणम्य है हम लोगों के लिए। पूरे भारत वर्ष नहीं बल्कि पूरे विश्व में संकटमोचन शताब्दी समारोह जैसा भव्य आयोजन होना चाहिए। सब प्रकार के संगीतकारों की कलाकारों की यहां पर उपस्थिति है। सब बड़े मन से यहां आकर गाते हैं। ये सबसे बड़ी बात है इस मंच की बाकी जगह आप देखेंगे कि शास्त्रीय संगीत हैं या कहीं कहीं नृत्य नहीं होता। यहां पर ऐसा कोई भेद भाव नहीं है।
तीसरी प्रस्तुति के रूप में संकट मोचन के दरबार में मालिनी अवस्थी ने छोटा ख्याल में एक बंदिश लंका जो धाय गये स्वामी को काज करैं... से गायन की शुरुआत की। इसके बाद राग माझ खमाज में ठुमरी जाग पड़ी मैं तो पीया के जगाने से... फिर इसी राग में दादरा तोहे लइ के संवरिया निकल चलबै... और बलम तोरे झगड़े में रैन गई... से गायन को विराम दिया।