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अठारह की त्रयी और इस बार का संकटमोचन संगीत समारोह

Fri, 06 Apr 2018 04:56 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 06 Apr 2018 04:56 PM IST
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Sankatmochan Sangeet Samaroh has unique connection with 18
पंडित बिरजू महाराज - फोटो : अमर उजाला
पंडित बिरजू महाराज धरा और सृष्टि के नृत्यरत होने की बड़ी दार्शनिक व्याख्या करते हैं। वह कहते हैं और अचरज के साथ हम सुनते हैं। उनका कहना होता है कि परिधि में हमारे सब नृत्यरत हैं। समुद्र भी नृत्य करता है और जब उसकी बड़ी लहरें चरम को प्राप्त कर वेग के साथ किनारे को छूती हैं तो वह उनका सम पर आना होता है।
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पंडित जी को नृत्य करते हुए इधर वर्षों बाद देखा। आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में ठीक संकट मोचन संगीत समारोह की बेला में अपनी सृजनात्मक यात्रा को स्वयं के लिए पुण्य उपलब्धि मानता हूं। यह समारोह वर्षों से कामनाओं में रहा है। वाराणसी गुणी संगीतज्ञों की जन्म-कर्मस्थली है। बनारस घराने की अद्वितीय संगीत परंपरा देश-दुनिया को स्वर, लय, ध्वनि से तरंगित करती है। इस घराने की संगीत की थाती जिन सच्चे कलाकारों की धरोहर रही, उन्होंने अपने यश और व्यक्तित्व वैभव से कला के अमरत्व को अर्थ दिए हैं।
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संकट मोचन संगीत समारोह में व्यतीत दो दिन अनमोल हैं। पहला दिन अनुभवों की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। वर्षों के आत्मीय और अति विनम्र अनूप जलोटा पहले दिन मिले तो व्यग्र प्रशंसकों के सेल्फी हठ के बीच भी यह जरूर बोले कि यहां मिलकर अच्छा लगा, अनुमान के उलट। मैंने भी विनत उत्तर दिया, आपसे मिलना तो सदैव ही सुखद है।
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2018 का समारोह संयोगों में अठारह की त्रयी जोड़ता है। संकट मोचन मंदिर की स्थापना का वर्ष1900 है। इस साल मंदिर 118 वर्ष का हो गया है। इसी प्रकार संकट मोचन संगीत समारोह का प्रकल्प संस्था के रूप में 1982 में अपने अस्तित्व में आया। इस तरह पिछली सदी के 18 और इस सदी के 18 साल, मंदिर की स्थापना रोचक त्रयी है। उसमें एक महान सांस्कृतिक अनुष्ठान के 95 वर्ष के संयोगों का संबल पृथक है।

अनुभूतियों में संकट मोचन समारोह का सबसे असाधारण प्रभाव यह है पूरे मंदिर परिसर में संगीत हमारी हर स्थल पर उपस्थिति को तरंगित करता है, जहां हम विचरण कर रहे होते हैं। स्वाभाविक रूप से भक्त का मंदिर में प्रवेश उसकी अपनी आत्मिक उदारता और श्रद्धा के वशीभूत मन की तृप्ति की सीमा तक विचरण करना, बैठना, दर्शन करना, देव छवि में एकाग्र होना तथा अपने मनोभावों में एक प्रकार से संतुष्टि प्रदाता उत्तरों को अनुभूत कर लेना होता है।

समारोह की प्रस्तुतियां हमारी ऐसी अनुभूतियों को अपने अनूठेपन के साथ अलंकृत करती हैं। कल्पना की जा सकती है, ऐसे में किसी सच्चे साधक और पवित्र हृदय गायक का स्वर, नृत्यांगना या नर्तक की भाव-भंगिमाओं का सम्मोहन तथा वादक के हुनर का अनुभूत सुख विलक्षण ही होगा, और फिर यदि वे बिरजू महाराज हुए तो बात ही क्या!

गेंद खेलने, सम और मित्रों को ढूढ़ने की तिहाई, भाव, आलिंगन आदि प्रदर्शन के माध्यम बने प्रदर्शनों में रसिकों और जिज्ञासुओं के सामने प्रोत्साहित करने का उदार भाव रहता है। यह भावनात्मक समर्थन पढ़ंत पर बैठे महान कलाकार पंडित बिरजू महाराज, उनके पूर्वजों की महान परंपरा को है, जिसे उसी विलक्षणपन के साथ निरंतरता प्रदान करने का सर्जनात्मक दायित्व त्रिभुवन और रागिनी महाराज और उनके घराने का है।

जाग्रत स्मृति और चैतन्यता में समारोह के प्रेक्षक, दर्शक, श्रोताओं को नेटवर्क कटने की तिहाई पर प्रोत्साहन देने में संकोच होता है तो वह स्वाभाविक ही है। सुखकारी यह रहा कि पंडित बिरजू महाराज अंत में मंच पर भाव प्रदर्शन के लिए पधारे और उन्होंने लखनऊ घराने की कथक परंपरा की उन अनमोल निधियों से वातावरण को आलोकित किया, जो घराने का वैभव हैं।

वे देर तक कथक रस में पूरे कविताई भाव और संवेदना के साथ, अपनेपन के साथ सबके बीच बने रहे। सितार पर नीरज मिश्र, तबले पर पंडित संजू सहाय और हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र ने नृत्य की सभा को परिपाक पर पहुंचाया।

संकट मोचन संगीत समारोह को उसी फलक पर गरिमा और अपेक्षाओं के साथ खरा उतारने के पीछे आस्था का जो भाव, चार वर्ष पूर्व स्वर्गवासी महंत जी के स्वप्न के साथ उनके अनुज और निष्ठित भाव से साथ चलने वाले सहयोगियों के कारण सतत तारतम्यता में है, वह अतुलनीय है।


उसके पीछे एक बड़ी सांस्कृतिक निष्ठा को विनत भाव में देखना सुखद लगता है, भाव विभोर कर देता है। अब यह उत्तरदायित्व वहन कर रहे संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्ववंभर नाथ मिश्र ऐसे ही आतिथेय हैं।
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