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संकटमोचन संगीत समारोह: 50वें साल में हरि प्रसाद चौरसिया ने रखा सुरों के मील का पत्थर, दर्शकों की लूटी वाहवाही
Mon, 29 Apr 2024 03:40 PM IST
अमन विश्वकर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Mon, 29 Apr 2024 03:40 PM IST
सार
Varanasi News: बांसुरी के उस्ताद के सुर मंदिर प्रांगण के कोने-कोने को भक्ति रस से सराबोर कर रही थी। मध्यम लय में शुद्ध स्वरों का उन्होंने वादन में बेहतरीन प्रयोग किया। आलाप की शुरुआत मंद्र निषाद से की।
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बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हौसलों के आगे हर मुश्किल बस शब्द बनकर रह जाती है। जब महाबली का दरबार हो तो असंभव कुछ भी नहीं रह जाता है। कांपते हाथों से हरिप्रसाद चौरसिया ने जब अधरों पर वेणु धरी तो हर किसी ने कला की साधना को महसूस किया। 50 वर्षों से अनवरत संकटमोचन के दरबार में प्रस्तुति देते आ रहे बांसुरीवादक पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने एक और मील का पत्थर रख दिया।
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संकटमोचन संगीत समारोह की दूसरी निशा में पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने रात 10 बजे मंच संभाला। हाथ पकड़कर उन्हें मंच पर पहुंचाया गया। मंच पर उनके लिए कुर्सी लगी हुई थी। हाथ कांप रहे थे, लेकिन जैसे ही बांसुरी हरिप्रसाद के होठों पर सजी तो सुरों के सप्तक खुद ब खुद निकलने लगे।
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हर किसी ने महसूस की कलासाधक की अनंत साधना
श्रोताओं का उत्साह और संकटमोचन का मंच देखकर उनमें जैसे नई ऊर्जा का प्रवाह होने लगा। पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने राग मारुविहाग की अवतारणा की। उन्होंने आलाप के बाद जोड़ बजाया। बांसुरी की हर फूंक पर हर कोई बस वाह-वाह कर रहा था। संगीत के सुधिजनों ने संगीत के साधक की इस अनन्य साधना को प्रणाम किया।
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हर किसी के अंतस तक बांसुरी की मिठास को महसूस किया।
जोड़ बजाने के बाद उन्होंने ओम जय जगदीश हरे... की धुन से वादन को विराम दिया। श्रोता भी ओम जय जगदीश हरे... के गायन के साथ तालियों से संगत कर रहे थे। पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ बांसुरी सहयोग में उनकी दो शिष्याएं शुचि श्वेता चटर्जी, किरण बिष्ट और शिष्य घनश्चाम चंद अपने गुर के पदचिह्नों पर आगे बढ़ते प्रतीतहुए। तबले पर आशीष राघवानी ने सधी हुई संगत की।