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प्रसिद्ध होना अब बहुत खलता है, जीना चाहता हूं आम आदमी की जिंदगीः संजय मिश्रा

Mon, 25 Jun 2018 12:47 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 25 Jun 2018 12:47 PM IST
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Sanjay mishra says that he like to live like a comman life not a celebrity
संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
कभी बेहद संजीदगी और गंभीरता तो कभी बेलौस बनारसी अंदाज के साथ अभिनय के अपने पूरे रंग व अंदाज में नजर आए। ये थे गोलमाल के बबली, आंखों देखी के राजे बाऊजी और अंग्रेजी में कहते हैं के एक उम्र बाद प्यार की परवान चढ़ने वाले यशवंत बत्रा।
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जी हां, मशहूर फिल्म अभिनेता संजय मिश्रा। उनकी एक फिल्म कामयाब जल्दी ही आने वाली है। बीएचयू में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में आए संजय मिश्रा शनिवार की शाम अमर उजाला कार्यालय में थे। संवाद के दौरान मिश्रा ने शुरुआती कॅरियर से लेकर 30 साल के अनुभव को साझा किया। 
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करीब एक घंटे की बातचीत में लगा ही नहीं कि जैसे उनसे कहीं बनारस छूटा हो, पूरा बनारसीपन। यही वजह है कि उन्हें यह बात कचोटती हैं कि अब बनारस में ही बनारस नहीं रहा। उन्हें साफ कहा, ‘रजा ई बनारस हौ, एकरा के मत छेड़ा...’ कहते हैं बनारस शहर नहीं चरित्र है।
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मेरे चरित्र पर इसका बड़ा असर पड़ा है। बनारस मेरा दोस्त है, मेरी मां हैं। ये शहर मां के आंचल जैसा है, जहां मैं खुद को सुरक्षित महसूस करता हूं। बनारस को उसके उसी चरित्र में रहने देना चाहिए।

गलियां, गंगा घाट, पान, भांग सब में एक अलग ही रंग है, उसे उसी रंग में रहने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब तो प्रसिद्ध होना भी बहुत खलता है। मुझे भी मन करता है कि गंगा के किनारे आराम से बैठूं और घाट के किनारे तफरीह करूं। अब यह संभव नहीं हो पाता है।

भारतीय संस्कृति और कला हो रही खत्म

Sanjay mishra says that he like to live like a comman life not a celebrity
संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ये सिनेमा का सबसे सार्थक दौर चल रहा है। फिल्मों से जुड़ाव बढ़ रहा है। दर्शक वर्ग भी बढ़ा है। फर्क बस ये आया है कि पहले फिल्म देखने जाना उत्सव सरीखा हुआ करता था और आज मोबाइल और लैपटॉप में सिमट गया है।

हाल ही में बनी फिल्म ‘अंग्रेजी में कहते हैं’ बनारस में ही शूट हुई थी लेकिन यहां रिलीज नहीं हो पाई। वजह, इसे नेट और मोबाइल पर देखा जा रहा है और फिल्म लागत से ज्यादा कमाई कर चुकी है। वहीं सरकार भी कम बजट की फिल्मों के प्रमोशन में मदद नहीं कर रही है।

मुंबई में मराठी फिल्मों को शासन का बहुत सपोर्ट मिलता है। बकौल संजय मिश्रा भारतीय संस्कृति और कला खत्म हो रही है। बुनियादी चीजों को छोड़ने का परिणाम है कि हम इसे संस्कृति, कला और पर्यावरण के नुकसान के रूप में भुगत रहे हैं।

20 साल बाद आने वाली पीढ़ी को क्या देंगे, ये नहीं सोच रहे। जरूरत है कि समाज ने जो दिया है, हम उसे लौटा दें। युवाओं को उनकी साफ सलाह है कि वे बॉलीवुड में हीरो नहीं बल्कि अभिनेता बनने के लिए आएं।

केवल अभिनेता बनने के लिए आएंगे तो निराशा हाथ मिल सकती है। नए प्रयोग हो रहे हैं, उनका हिस्सा बनकर भी युवा अपना मुकाम हासिल कर सकते हैं।

दो मिनट की हो गई है जिंदगी

Sanjay mishra says that he like to live like a comman life not a celebrity
संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
अब तो जिंदगी केवल दो मिनट की हो गई है। सभी को सब कुछ जल्दी जल्दी चाहिए। संगीत, भोजन और कला में इसके कारण कई बदलाव आए हैं। जब शुरुआत की थी तो मेरे पास च्वाइस नहीं थी जो मिला उसको लपक लिया। जब चाहत खत्म होने के बाद जागती है तो उसका अलग ही मजा है।

गोलमाल काल्पनिक चरित्र है और आंखो देखी व कड़वी हवा हमारे आसपास के चरित्र हैं। दर्शक अब आंखो देखी, कड़वी हवा और मशान जैसी फिल्में देखना चाहते हैं। जिंदा रहने के लिए यह जरूरी है कि खुद को सक्रिय रखिए। जब तक हम सक्रिय हैं तब तक युवा हैं। जानना शुरू किजिए और सुनने की क्षमता रखिए। 
 

रणवीर कपूर ने 'संजू; में शानदार काम किया

Sanjay mishra says that he like to live like a comman life not a celebrity
संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
कहते हैं कि हर किसी की बॉयोपिक नहीं बन सकती है। जिसकी जिंदगी में कहानी है, ड्रामा है और रोमांच है वही बॉयोपिक सभी के लिए आकर्षण का केंद्र होती है। चकाचौंध वाली जिंदगी का नाम है संजय दत्त। संजय दत्त की बॉयोपिक में रणवीर कपूर ने शानदार काम किया है। रणवीर ने संजय दत्त के बॉयोपिक को पर्दे पर बेहतरीन ढंग से जीवंत किया है। ऐसी फिल्मों से बॉक्स ऑफिस पर कई भ्रम टूट रहे हैं और कुछ नए भ्रम बन भी रहे हैं।

मुझे सिर्फ कलाकार के तौर पर याद रखें

Sanjay mishra says that he like to live like a comman life not a celebrity
संजय मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
मिश्रा की ख्वाहिश है कि उनकी पहचान कलाकार के रूप में ही रहे। कहते हैं कि जीना और मरना इसी रूप में चाहता हूं। मुझे जो रोल मिला, पूरी गंभीरता से किया। जब ताकत थी तो काम नहीं था, आज ताकत नहीं है तो काम है।

कहते हैं ना कि  चाहत खत्म होने के बाद जब जागती है तो उसका अलग मजा है। उनकी एक इच्छा यह भी है कि वे साईं बाबा की भूमिका निभाएं, जिसमें उनके मानवीय और कल्याणकारी पक्ष को दर्शाया जाए।
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