वाराणसीः मूल स्वरूप में लाई जाएगी गंगा की नहर, बाढ़ का पानी उतरने के बाद नए सिरे से होगा काम
वाराणसी में गंगा पार रेती में 11.95 करोड़ रुपये की लागत से 5.3 किमी लंबी और 45 मीटर चौड़ी नहर बनाई गई थी। बाढ़ के दौरान नहर गंगा में समा गई। इसमें सरकारी विभागों की लापरवाही सामने आई।
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गंगा के अविरल प्रवाह को घाटों पर दबाव बनाए बिना आगे बढ़ाने के लिए रेती के पास बनाई जा रही नहर को मूल स्वरूप में लाया जाएगा। इसमें सरकारी विभागों की लापरवाही की भी जांच होगी और बाढ़ का पानी उतरने के साथ ही यूपीपीसएल काम शुरू कर देगा। इससे निकलने वाले बालू व मिट्टी के उठान का भी टेंडर जिला प्रशासन करेगा।
रामनगर से अस्सी घाट के बीच 45 मीटर चौड़ी नहर को बनाने में हुई लापरवाही का शासन ने भी संज्ञान लिया है। इसमें सिंचाई विभाग की परियोजना को बंधी प्रखंड से एग्रीमेंट कराकर मैकेनिकल खंड से भुगतान के मामले को बेहद गंभीर माना गया है।
इसके अलावा परियोजना की निगरानी व गुणवत्ता जांच के लिए नोडल बनाए गए प्रयागराज के चीफ इंजीनियर का एक बार भी मौके पर निरीक्षण नहीं करना शासन ने लापरवाही मानी है। इस मामले में जुलाई में सेवानिवृत्त हो चुके चीफ इंजीनियर को भी नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा गया है।
यहां बता दें कि काशी के अर्द्धचंद्राकार घाटों पर गंगा से बढ़ते दबाव को कम करने के लिए गंगा पार रेती की ओर नहर बनाने की परियोजना बनाई गई। इसमें 45 मीटर चौड़ी नहर से गंगा में बनाकर गंगा के प्रवाह को समान किया जाना है।
मगर, सिंचाई विभाग ने 11.95 करोड़ रुपये की इस परियोजना की जिम्मेदारी यूपीपीसीएल की बलिया इकाई को दी गई और इसका एमओयू (समझौता पत्र) सिंचाई विभाग की बंधी खंड से किया गया। बंधी खंड को इस एमओयू की प्रति तक नहीं दी गई और उसे इस परियोजना में शामिल ही नहीं किया गया।
जुलाई महीने में आई बाढ़ में नहर की मिट्टी गंगा में समा कर पूरी परियोजना गंगा की धारा में बह गई। जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने कहा कि गंगा में बाईपास नहर परियोजना को रिस्टोर करने के लिए यूपीपीसीएल को निर्देश दिया गया है। शासन को भी पूरी रिपोर्ट भेजी गई है और वहां से जांच शुरू कराई गई है।