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रिंग रोड बनने से पहले ही बढ़ गए जमीन के रेट
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 22 Apr 2017 02:06 AM IST
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रिंग रोड प्रभावित गांवों के किसान।
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प्रस्तावित रिंग रोड बनने के बाद राष्ट्रीय राजमार्गों पर पड़ने वाले शहरों की दूरियां तो निश्चित तौर पर कम हो जाएंगी पर विकास की इस योजना के लिए अपनी जमीन देने वाले हजारों किसान अपनों से दूर हो जाएंगे। लंबी लड़ाई के बाद किसानों को जो मुआवजा मिल रहा है, उससे रिंग रोड के आसपास जमीन खरीदना उनके लिए संभव नहीं है। मुआवजा राशि से किसान रिंग रोड से 10 से 15 किलोमीटर अंदर जमीन खरीदनी पड़ रही है।
किसानों को जमीन के बदले चार से छह लाख रुपये बिस्वा का मुआवजा मिल रहा है तो वहीं रिंग रोड के इर्द-गिर्द की जमीन पर कॉलोनाइजर्स हावी हो गए हैं। ऐसे में रिंग रोड के पास एक बिस्वा जमीन 15 से 25 लाख आसपास के क्षेत्र में 10 से 12 लाख रुपये बिस्वा में मिल रही है। प्रभावित किसान चाहकर भी अपने मुहल्ले और गांव छोड़कर दूरदराज सस्ते में जमीन खरीदने को मजबूर हैं।
शहर को जाम मुक्त करने और विभिन्न क्षेत्रों को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को आपस में जोड़ने के लिए 2002 में रिंग रोड योजना पर काम शुरू हुआ था। इसके लिए बड़ी संख्या में किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया। कई के मकान टूटे तो कई किसानों की कृषि योग्य पूरी की पूरी जमीन रिंग रोड की जद में आ गई। सबने सोचा था कि जब मुआवजा मिलेगा तो वे इससे और जमीन खरीदेंगे-घर बनवाएंगे।
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रिंग रोड का काम छह मई के बाद भी शुरू होना मुश्किल है। फिलहाल, प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की बातें जुबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं हैं। प्रस्तावित रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण के दायरे में आने वाले 14 गांवों में मुआवजे का पेंच फंसा हुआ है। किसानों का कहना है कि हमें मुआवजा दे दें और काम शुरू करें। काम शुरू कराने के लिए आए दिन प्रशासनिक अधिकारी और निर्माण कराने वाली संस्था के प्रतिनिधि किसानों से मिल रहे हैं वहीं हृदयपुर सहित विभिन्न गांवों के किसान रोजाना धरना स्थल पर बैठ कर काम रोकने की तैयारी करने की तैयारी करते हैं। दूसरी ओर एसएलओ कार्यालय में मुआवजा भी बांटा जा रहा है। शुक्रवार को मुआवजे के तौर पर चार करोड़ बांटे गए। प्रशासन का दावा है कि अब तक 240 करोड़ में से 140 करोड़ रुपये बांटा जा चुका है। 2200 किसानों में से 1200 किसान इससे लाभान्वित हुए हैं। हालांकि अधिकारियों के पास गांववार रिकार्ड उपलब्ध नहीं है कि उन्होंने कितने किसानों को कितनी राशि मुआवजे के तौर पर दी है।
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किसानों को जमीन के बदले चार से छह लाख रुपये बिस्वा का मुआवजा मिल रहा है तो वहीं रिंग रोड के इर्द-गिर्द की जमीन पर कॉलोनाइजर्स हावी हो गए हैं। ऐसे में रिंग रोड के पास एक बिस्वा जमीन 15 से 25 लाख आसपास के क्षेत्र में 10 से 12 लाख रुपये बिस्वा में मिल रही है। प्रभावित किसान चाहकर भी अपने मुहल्ले और गांव छोड़कर दूरदराज सस्ते में जमीन खरीदने को मजबूर हैं।
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शहर को जाम मुक्त करने और विभिन्न क्षेत्रों को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को आपस में जोड़ने के लिए 2002 में रिंग रोड योजना पर काम शुरू हुआ था। इसके लिए बड़ी संख्या में किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया। कई के मकान टूटे तो कई किसानों की कृषि योग्य पूरी की पूरी जमीन रिंग रोड की जद में आ गई। सबने सोचा था कि जब मुआवजा मिलेगा तो वे इससे और जमीन खरीदेंगे-घर बनवाएंगे।
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रिंग रोड का काम छह मई के बाद भी शुरू होना मुश्किल है। फिलहाल, प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की बातें जुबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं हैं। प्रस्तावित रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण के दायरे में आने वाले 14 गांवों में मुआवजे का पेंच फंसा हुआ है। किसानों का कहना है कि हमें मुआवजा दे दें और काम शुरू करें। काम शुरू कराने के लिए आए दिन प्रशासनिक अधिकारी और निर्माण कराने वाली संस्था के प्रतिनिधि किसानों से मिल रहे हैं वहीं हृदयपुर सहित विभिन्न गांवों के किसान रोजाना धरना स्थल पर बैठ कर काम रोकने की तैयारी करने की तैयारी करते हैं। दूसरी ओर एसएलओ कार्यालय में मुआवजा भी बांटा जा रहा है। शुक्रवार को मुआवजे के तौर पर चार करोड़ बांटे गए। प्रशासन का दावा है कि अब तक 240 करोड़ में से 140 करोड़ रुपये बांटा जा चुका है। 2200 किसानों में से 1200 किसान इससे लाभान्वित हुए हैं। हालांकि अधिकारियों के पास गांववार रिकार्ड उपलब्ध नहीं है कि उन्होंने कितने किसानों को कितनी राशि मुआवजे के तौर पर दी है।