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रामलीला: बहुओं के आगमन पर इठलाई प्रजा, अयोध्या पहुंचीं चारों वधुएं; पारंपरिक लोकगीतों से स्वागत

Fri, 02 Oct 2026 05:49 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 02 Oct 2026 05:49 AM IST
सार

रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में अयोध्या पहुंचीं चारों वधुओं के आगमन पर प्रजा ने खुशी जताई। सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति के पहुंचने पर पारंपरिक लोकगीतों के साथ स्वागत किया गया। विवाह के बाद बहुओं के आगमन का दृश्य देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। लोकगीतों और पारंपरिक उत्सव ने रामलीला में विशेष रंग भर दिया।

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Ramlila Subjects rejoice arrival daughters in law four brides reach Ayodhya welcomed traditional folk songs
रामलीला के सातवें दिन पात्रों ने अपनी लीला से सभी को भावुक कर दिया। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अवध के आंगन में जब चारों बहुओं के पैर पड़े, तो समूची प्रजा इठलाई। वहीं, इससे पहले चार बेटियों की एक साथ विदाई पर राजा जनक और माता सुनयना के मार्मिक संवादों ने श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं। रामलीला के सातवें दिन पात्रों ने अपनी लीला से सभी को भावुक कर दिया।

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रामलीला में शामिल होने के लिए कुंवर अनंत नारायण परिवार समेत चार हाथियों पर सवार होकर पहुंचे। वह चारों भाइयों की बारात में बराती बनकर पहुंचे थे। जनकनंदिनी की विदाई से पूर्व मिथिला में जेवनार और खिचड़ी खाने की रस्म अदा की गई। 
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आज के दौर में आधुनिक विवाहों से गायब हो चुकी इस रस्म में जब प्रभु श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ और परिजनों के साथ आंगन में खिचड़ी खाने बैठे, तो जनकपुर की महिलाओं ने परंपरानुसार हंसी-ठिठोली भरी गालियां गाईं। महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रहीं रीता देवी ने खा लो खा लो खिचड़ी मेरे राम लला... जैसे पारंपरिक लोकगीतों से समधी दशरथ और बरातियों का परिहास किया। इस मीठी नोकझोंक पर राजा दशरथ ने प्रसन्न होकर महिलाओं को नेग दिया।

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दहेज और उपहारों के साथ जनकपुर से विदाई के बाद चारों राजकुमार अपनी-अपनी दुल्हनों को लेकर अयोध्या पहुंचे। आधुनिकता की दौड़ में ओझल हो चुकी डोली और कहारों की परंपरा आज भी रामनगर की लीला में पूरी गरिमा के साथ जीवंत दिखी। जब जनकनंदिनी सीता सहित चारों वधुएं डोली में बैठकर अयोध्या के मुख्य द्वार पर पहुंचीं, तो पालकी में विराजमान श्रीराम-जानकी की अलौकिक झांकी ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मनोरम दृश्य के दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु, विशेषकर महिलाएं, उमड़ी थीं, जिनका मानना है कि वे अपने घर आई नई बहुओं के स्वागत के लिए वहां उपस्थित हुई हैं।

द्वार पर माताओं ने पारंपरिक रीति से श्रीराम-सीता का परिछन किया और मंगल आरती उतारकर उन्हें राजमहल में प्रवेश कराया। सिंहासनारूढ़ नवदंपतियों को माताओं ने शुभाशीष दिया। इसके पश्चात राजा दशरथ ने रानियों को सीख देते हुए कहा कि बहुएं अभी अबोध बालिकाएं हैं और पराए घर से आई हैं, अतः उन्हें सदैव पलकों पर बिठाकर स्नेह और दुलार दिया जाए। लीला के अंतिम चरण में शयन झांकी और मुनि विश्वामित्र की ससम्मान विदाई संपन्न हुई। आठों स्वरूपों की भव्य महाआरती के साथ ही श्रीरामचरितमानस के 'बालकांड' के प्रसंग का विधिवत समापन हुआ।

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