रामलीला: चार मिनट की आरती के लिए साढ़े सात घंटे किया इंतजार, 60 हजार श्रद्धालु शामिल; गूंजा हरि नाम
Varanasi News: रविवार की राज्याभिषेक की लीला के बाद श्रद्धालुओं ने भोर की आरती का इंतजार शुरू कर दिया। कहीं हरि नाम कीर्तन तो कहीं भजन मंडली की टोली पूरी रात भगवान के भजनों में जुटी रही।
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साढ़े सात घंटे के इंतजार के बाद श्रद्धालुओं ने जब चार मिनट की भोर की आरती के दर्शन किए तो पूरा परिसर जय सियाराम के जयकारे से गूंज उठा। पूरब में भगवान सूर्य की लालिमा आसमान में नजर आ रही थी तो वहीं दूसरी ओर सूर्यवंशी भगवान राम के दरबार की भव्य आरती के स्वर गूंज रहे थे। 60 हजार से ज्यादा श्रद्धालु इस लीला के साक्षी बने। इसके साथ ही महीने भर चली रामलीला को विश्राम दिया गया।
एक माह तक चलने वाली रामलीला में भोर की आरती का महत्व होता है। रामलीला के दौरान यह पहला मौका होता है जब श्रीराम की आरती राज्याभिषेक के बाद होती है। आधुनिकता से दूर अपने अनूठे प्रसंग, पात्र और अद्भुत लीला की बदौलत ही धार्मिक अनुष्ठान के रूप में पूरे संसार में अपनी पहचान पा चुकी रामनगर की रामलीला में हर कोई शामिल होना चाहता है।
विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला की भोर की आरती में सोमवार की सुबह मानो पूरी काशी आरती का हिस्सा बनने के लिए उमड़ पड़ी। भोर की आरती में जन सैलाब उमड़ा तो आस्था का रेला गांव गली और मोहल्लों से होता हुआ रामलीला स्थल की ओर पहुंच गया।
5:35 बजे आरती के लिए पैदल निकले अनंत नारायण सिंह
रामलीला में सोमवार को तड़के लगभग 5:35 बजे आरती के लिए रामनगर दुर्ग से अनंत नारायण सिंह राजपरिवार के सदस्यों व दरबारियों के साथ पैदल चलकर लीला स्थल अयोध्या मैदान पहुंचे। लगभग 5:45 बजे भगवान सूर्य ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं और माता कौशल्या ने अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान श्रीराम व सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा श्रीराम के चरणों में नतमस्तक भक्त शिरोमणि हनुमान की आरती उतारी।
लाल, सफेद महताबी रोशनी के बीच चार मिनट की इस आरती झांकी की अनुपम छटा को उपस्थित विशाल जनसमूह ने अपने मानस पटल पर वर्ष भर के लिए अंकित किया। अनंत नारायण सिंह ने भी खड़े होकर राम राज्याभिषेक की आरती के दर्शन किए। अनंत नारायण सिंह आरती के बाद हवाखोरी के लिए निकले। वहीं, श्रीराम को कंधे पर उठाए बजरंग बली व सीता, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न भक्तगणों के कंधे पर बैठ बाजार भ्रमण के प्रसंग को संपन्न कराने के लिए लीलास्थल से बलुआघाट स्थित धर्मशाला पहुंचे।