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वक्त है घर में दुआओं का, फिर गुलजार होंगी मस्जिदें... आमीन

Wed, 29 Apr 2020 01:00 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 29 Apr 2020 01:00 AM IST
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वाराणसी। तारीख गवाह है कि रमजान में ऐसा मंजर किसी ने नहीं देखा होगा कि मस्जिदें इस तरह सूनी रही हों। हमने दंगों का भी दौर देखा है लेकिन उस वक्त भी कभी मस्जिदें ऐसी खाली नहीं रहीं। उस दौर में वो वक्त का तकाजा था कि मस्जिदें आबाद रहें और आज वक्त का तकाजा ये है कि हम घरों में रहें। एहतियात बरतें और लॉक डाउन का पालन करें। इस मुसीबत से निजात पाने का यही तरीका है। इंशा अल्लाह वो वक्त भी आएगा जब हम रब्बुल इज्जत का शुक्रिया अदा करने उन्हीं मस्जिदों में होंगे और वो मस्जिदें फिर से आबाद होंगी। ये कहना है मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी का।
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बेशक आज हम उस दौर से गुजर रहे हैं जिसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा हो। इतिहासकार व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. मोहम्मद आरिफ कहते हैं कि मैंने 1971 का वो दौर देखा है जब ब्लैक आउट हुआ करता था तो भी मस्जिदें इतनी खाली नहीं होती थीं। यहां तक कि 1857 के दौरान भी इतना मस्जिदों में इतना सन्नाटा नहीं था जबकि अंग्रेजों का जुल्मों सितम चरम पर था। उस मुश्किल दौर से गुजरने का भी इबादत ही एक जरिया था आज भी वही है। इबादत के साथ-साथ लोग शासन प्रशासन का हर फरमान मान रहे हैं, ये एक सुखद पहलू है।
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रेलवे से रिटायर्ड 95 वर्षीय मिर्जा प्यारे हसन बेग कहते हैं कि मैंने भी अपनी पूरी जिंदगी में रमजान में इतनी वीरानी नहीं देखीं। मस्जिदों में इतना सूनापन नहीं देखा। दालमंडी निवासी मिर्जा बेग का कहना है कि ये वही दालमंडी है जहां रमजान में तिल भर पांव रखने को जगह नहीं होती थी और आज यहां सन्नाटा पसरा है। पाक परवरदिगार हमें ये दिन भी दिखाएगा ऐसा शायद किसी ने नहीं सोचा था। दुनिया के तमाम मुल्क ऐसी वबा से गुजरे हैं लेकिन एक साथ पूरी दुनिया किसी महामारी से जूझ रही हो ऐसा कभी नहीं हुआ। सैयद फरमान हैदर कहते हैं कि मैंने अपनी साठ साल की जिंदगी में कभी ऐसा नहीं देखा कि रमजान में घरों में इबादत हो रही हो और मस्जिदें सूनी हों। इफ्तार के वक्त मस्जिदों में लोग न हों। मुस्लिम इलाकों की रौनक रमजान में इस कदर बेनूर हों। बेशक अल्लाह हमारा इम्तिहान ले रहा है और हमें पूरे सब्र के साथ इस इम्तिहान से पार पाना है। मुश्किलें उसकी ही दी हुई हैं तो रास्ता भी वही निकालेगा।
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