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रामकथा मानस मसान में मोरारी बापू ने कहा, मृत्यु में जीवन से अधिक गहराई
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Sat, 28 Oct 2017 06:10 PM IST
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मोरारी बापू
- फोटो : अमर उजाला
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डोमरी में चल रही संगीतमय रामकथा मानस मसान में संत मोरारी बापू ने अयोध्या कांड में वर्णित मसान प्रसंग के जरिए मानस के ऊंचे मानकों पर स्थापित राम के आदर्शों को व्याख्यायित किया। उन्होंने यज्ञ, दान और तप की शक्तियों की महिमा बताई।
कहा कि इन तीनों शक्तियों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जीवन एक यज्ञ है जो दान और तप के बिना पूरा नहीं हो सकता। रामकथा में बापू ने कहा कि मन में राम नाम का स्मरण हो और प्राण निकल जाएं तो मृत्यु मंगलकारी हो जाती है।
विश्वामित्र ने यज्ञ की रक्षा के लिए राम रूपी सत्य और लक्ष्मण रूपी त्याग-जागृति को दशरथ से प्राप्त किया था। यज्ञ की पूर्णता के लिए सत्य और त्याग का होना जरूरी है। मृत्यु और मसान की गहराई को उन्होंने परिभाषित किया। कहा कि जीवन में जितनी गहराई नहीं है उतनी गहराई मृत्यु में है।
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मृत्यु के केंद्र में राम होंगे तो निर्वाण अवश्य होगा। बापू ने बताया कि समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी, लेकिन मसान मंथन करने पर सात रत्नों की प्राप्ति होती है।
मसान मंथन का पहला रत्न शांति, दूसरा रत्न प्राप्ति, तीसरा कीर्ति, चौथा अनाशक्ति, पांचवां भक्ति, छठवां रत्न आत्म ज्योति और सातवां ध्रुति है। उन्होंने कहा कि मसान की अस्वच्छता हमें डराती है। जहां शिव का वास हो वहां अपवित्रता हो ही नहीं सकती।
गंगा से पवित्र कोई नहीं है, क्योंकि जहां शिव होते हैं वहां गंगा होती है। इसलिए मसान पवित्र और महामंदिर है। इसलिए गंगा और श्मशान को स्वच्छ रखें। शुभ श्रवण हमें भय मुक्त करता है।
दूसरों की निंदा को सुनेंगे तो मन में भय का बीजारोपण हो जाएगा। श्रद्धा और पुरुषार्थ हमें भयमुक्त करते हैं क्योंकि शंकर को पार्वती से अलग नहीं किया जा सकता है और यही हमारी श्रद्धा है।
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कहा कि इन तीनों शक्तियों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जीवन एक यज्ञ है जो दान और तप के बिना पूरा नहीं हो सकता। रामकथा में बापू ने कहा कि मन में राम नाम का स्मरण हो और प्राण निकल जाएं तो मृत्यु मंगलकारी हो जाती है।
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विश्वामित्र ने यज्ञ की रक्षा के लिए राम रूपी सत्य और लक्ष्मण रूपी त्याग-जागृति को दशरथ से प्राप्त किया था। यज्ञ की पूर्णता के लिए सत्य और त्याग का होना जरूरी है। मृत्यु और मसान की गहराई को उन्होंने परिभाषित किया। कहा कि जीवन में जितनी गहराई नहीं है उतनी गहराई मृत्यु में है।
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मृत्यु के केंद्र में राम होंगे तो निर्वाण अवश्य होगा। बापू ने बताया कि समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी, लेकिन मसान मंथन करने पर सात रत्नों की प्राप्ति होती है।
मसान मंथन का पहला रत्न शांति, दूसरा रत्न प्राप्ति, तीसरा कीर्ति, चौथा अनाशक्ति, पांचवां भक्ति, छठवां रत्न आत्म ज्योति और सातवां ध्रुति है। उन्होंने कहा कि मसान की अस्वच्छता हमें डराती है। जहां शिव का वास हो वहां अपवित्रता हो ही नहीं सकती।
गंगा से पवित्र कोई नहीं है, क्योंकि जहां शिव होते हैं वहां गंगा होती है। इसलिए मसान पवित्र और महामंदिर है। इसलिए गंगा और श्मशान को स्वच्छ रखें। शुभ श्रवण हमें भय मुक्त करता है।
दूसरों की निंदा को सुनेंगे तो मन में भय का बीजारोपण हो जाएगा। श्रद्धा और पुरुषार्थ हमें भयमुक्त करते हैं क्योंकि शंकर को पार्वती से अलग नहीं किया जा सकता है और यही हमारी श्रद्धा है।