काशी की बोलचाल और ट्रैफिक में भी पं. बिरजू महाराज ढूंढते थे लयकारी
पं. बिरजू महाराज के शिष्य विशाल कृष्णा ने बताया कि बीती रात युवा बनारस के आयोजन से भी गुरु जी जुड़े थे। रूपवाणी स्टूडियो लोहटिया में आयोजित तीन दिनी युवा बनारस कार्यक्रम की अंतिम निशा में ख्यात नर्तक विशाल कृष्णा की प्रस्तुति देखकर वह अभिभूत हो गए थे।
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पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज के साथ पिछले 10 साल से मंच साझा कर रहे रजनीश मिश्र ने बताया कि कथक सम्राट का काशी से दिल का रिश्ता था। वह देश में कहीं भी रहें लेकिन बनारस आने का न्यौता मिला नहीं कि वह बच्चों की तरह चहक उठते थे। दस दिन पहले से ही बनारस आने की तैयारियां शुरू कर देते थे।
काशी में ही उनकी ससुराल और समधियाना दोनों था। कथक सम्राट के साथ कई बार कला आश्रम में मंच साझा करने का अवसर मिला था। काशी के ट्रैफिक और बोलचाल में भी वह लय खोजते थे। जब वह नृत्य करते थे तो साक्षात कृष्ण की तरह ही नजर आते थे। उनके निधन से शास्त्रीय संगीत जगत में जो रिक्तता आई है उसकी भरपाई करना नामुमकिन है।
पं. बिरजू महाराज के शिष्य विशाल कृष्णा ने बताया कि बीती रात युवा बनारस के आयोजन से भी गुरु जी जुड़े थे। रूपवाणी स्टूडियो लोहटिया में आयोजित तीन दिनी युवा बनारस कार्यक्रम की अंतिम निशा में ख्यात नर्तक विशाल कृष्णा की प्रस्तुति देखकर वह अभिभूत हो गए थे। विशाल को उन्होंने अपना आशीर्वाद भी दिया था।
अच्छन महराज ने गंडा बांधने के लिए बेटे बिरजू से लिए थे पैसे
बिरजू को नृत्य सिखाने के लिए उनके पिता पंडित अच्छन महाराज ने उनसे एक दिन 500 रुपये मांग लिए। यह राशि घराने की धरोहर प्राप्त करने के लिए थी। जब गंडा बांधने का समय आया तो अच्छन महाराज अपनी पत्नि से बोले कि जब तक तुम्हारा लड़का नजराना नहीं देगा तब तक गंडा नहीं बांधूगा। इसके बिना कोई भी विद्या पूरी नहीं होती।
बिरजू महराज ने इस पेशकश के बाद डांस के दो प्रोग्राम किए जिससे 500 रुपये उन्हें मिले और पिता को दे दिया। तब जाकर गंडा बंधाई की रस्म पूरी हुई। पं. बिरजू महाराज ने अपने पिता की मौत के बाद दसवां और तेरहवीं करने के लिए शो करके पैसे जुटाता है। पंडित बिरजू महराज ने एक इंटरव्यू में यह बातें कहीं थीं।