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प्रभाती रागों की सबसे बड़ी संगीत यात्रा बना ‘सुबह-ए-बनारस’
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 08 Apr 2016 02:08 AM IST
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यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में ‘सिटीज ऑफ म्यूजिक’ के तौर पर दर्ज बनारस में ‘सुबह-ए-बनारस’ की महफिल ने गुरुवार को 501 दिन का सफर तय कर सुबह के रागों से संगीत के सफर का कीर्तिमान बना लिया। प्रभाती रागों के साथ हर रोज नए कलाकारों की प्रस्तुति की यह दुनिया की इकलौती संगीत यात्रा बन गई है। क्षेत्रीय संस्कृति अधिकारी डॉ. रत्नेश वर्मा का कहना है कि दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां शास्त्रीय संगीत के किसी आयोजन ने सुबह के रागों के साथ इतना लंबा सफर तय किया हो। यह रिकॉर्ड बनाने के मौके पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण ने जिला सांस्कृतिक समिति और इस आयोजन से जुड़े लोगों के प्रयासों की सराहना की।
पौ फटने के साथ यज्ञ, हवन, आरती के साथ गंगा की लहरों पर इठलाती सूर्य की रश्मियों की छटा सुबहे बनारस के रूप में अब रागों-बंदिशों की महफिल के साथ सोने पर सुहागा साबित होने लगी है। कभी जहां विदेशियों के लिए सुबह-ए- बनारस नौका विहार तक सीमित था, वहीं अब यह अपना नया विस्तार ले रहा है। खुशी की बात यह है कि आने वाले पूरे जून भर की बुकिंग अभी से हो चुकी है। अमेरिका, फ्रांस जर्मनी, इंग्लैंड, जापान के कलाकार भी सुबहे बनारस में हाजिरी लगाने के लिए फोन और मेल के जरिए लगातार संपर्क साध रहे हैं। काशी में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने सुबह के रागों को जोड़ने का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2012 में प्रदेश सरकार को भेजा था। 24 नवंबर 2014 की सुबह पहली महफिल सजाने में कामयाबी मिल सकी थी। गुरुवार को 501 दिन का सफर पूरा होने पर आयोजित महफिल में उप शास्त्रीय गायिका सुचरिता गुप्ता ने ठुमरी, चैती और होरी से समां बांधा। मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण के अलावा अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वरपुरी महाराज ने इस मौके पर सांस्कृतिक पंचांग का विमोचन किया।
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पौ फटने के साथ यज्ञ, हवन, आरती के साथ गंगा की लहरों पर इठलाती सूर्य की रश्मियों की छटा सुबहे बनारस के रूप में अब रागों-बंदिशों की महफिल के साथ सोने पर सुहागा साबित होने लगी है। कभी जहां विदेशियों के लिए सुबह-ए- बनारस नौका विहार तक सीमित था, वहीं अब यह अपना नया विस्तार ले रहा है। खुशी की बात यह है कि आने वाले पूरे जून भर की बुकिंग अभी से हो चुकी है। अमेरिका, फ्रांस जर्मनी, इंग्लैंड, जापान के कलाकार भी सुबहे बनारस में हाजिरी लगाने के लिए फोन और मेल के जरिए लगातार संपर्क साध रहे हैं। काशी में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने सुबह के रागों को जोड़ने का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2012 में प्रदेश सरकार को भेजा था। 24 नवंबर 2014 की सुबह पहली महफिल सजाने में कामयाबी मिल सकी थी। गुरुवार को 501 दिन का सफर पूरा होने पर आयोजित महफिल में उप शास्त्रीय गायिका सुचरिता गुप्ता ने ठुमरी, चैती और होरी से समां बांधा। मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण के अलावा अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वरपुरी महाराज ने इस मौके पर सांस्कृतिक पंचांग का विमोचन किया।
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