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कुंडों में जलकुंभियों की समस्या का होगा स्थायी समाधान
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वाराणसी। काशी में पौराणिक महत्व के कुंडों-सरोवरों के अस्तित्व पर छाए संकट के बादल अब जल्द छंटेंगे। कुंडों की सबसे बड़ी समस्या जलकुंभियों की है। इसकी सफाई पर हर साल नगर निगम लाखों रुपए खर्च करता है। इसके बावजूद फिर से जलकुंभी पैदा हो जाती है। इसके स्थायी समाधान के लिए अब नगर निगम बीएचयू के विशेषज्ञों की मदद लेगा। उनके साथ सभी कुंडों का सर्वे कराया जाएगा।
ऋषियों, मुनियों ने जहां तप किए, वहां तीर्थ बन गए। काशी में कई पौराणिक कुंडों का अतीत ऐसी ही तपस्थलियों से जुड़ा रहा है। सोनिया, पुष्कर और लल्लापुरा में स्थित पितृकुंड इन्हीं में से एक है। कहा जाता है कि गंगा के अवतरण के पहले से ही इस कुंड में पूर्वजों को तारने के लिए अस्थि विसर्जन के साथ ही तर्पण-अर्पण किया जाता रहा है। अब भी पितृकुंड में तर्पण-अर्पण के लिए भीड़ लगी रहती है, लेकिन जलकुंभी की छाया ने इसे भी घेर लिया है।
कुंडों में गंदगी से बीमारी फैलने की आशंका
काशी के जलतीर्थों के रूप में प्रसिद्ध कुंडों में जलकुंभियों के अलावा गंदा पानी बहाया जा रहा है। कूड़े और पालीथिन सड़ने से आसपास के मोहल्लों में बीमारी फैलने की आशंका है। आए दिन मछलियों के मरने से लोग सकते में रहते हैं। 200 से अधिक कुंडों वाली काशी में यह संकट नया नहीं है। इससे पहले 150 से अधिक कुंडों-तालाबों को पाट कर कब्जा किया जा चुका है। करीब 66 कुंड-तालाब जो बचे हैं। उनमें जलकुंभियों की भरमार है। कर्णघंटा तालाब, सोनभद्र तालाब, कुरुक्षेत्र तालाब, लक्ष्मी कुंड, शंकुल धारा तालाब के भी जलकुंभियों से भरे हैं।
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कुंडों में जलकुंभियों की समस्या का समाधान कराने के लिए बीएचयू के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। इसके लिए नगर निगम और विशेषज्ञ सर्वे करेंगे। कुछ केमिकल के जरिए इन पर लगाम लगाने के साथ कुंडों का सुंदरीकरण कराया जाएगा।-गौरांग राठी, नगर आयुक्त
कुंडों की सफाई पर प्रतिवर्ष 14 लाख रुपये का खर्च
कुंडों की सफाई पर नगर निगम प्रतिवर्ष 14 लाख रुपये खर्च करता है। यही नहीं कई कुंडों पर स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से श्रमदान भी चल रहा है। लेकिन, जलकुंभियों की संख्या कम नहीं हो रही है। बीते पांच सालों में नगर निगम 50 लाख रुपए से अधिक कुंडों की सफाई पर खर्च कर चुका है, लेकिन हर बार गंदगी और जलकुंभी की समस्या बनी रहती है।
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ऋषियों, मुनियों ने जहां तप किए, वहां तीर्थ बन गए। काशी में कई पौराणिक कुंडों का अतीत ऐसी ही तपस्थलियों से जुड़ा रहा है। सोनिया, पुष्कर और लल्लापुरा में स्थित पितृकुंड इन्हीं में से एक है। कहा जाता है कि गंगा के अवतरण के पहले से ही इस कुंड में पूर्वजों को तारने के लिए अस्थि विसर्जन के साथ ही तर्पण-अर्पण किया जाता रहा है। अब भी पितृकुंड में तर्पण-अर्पण के लिए भीड़ लगी रहती है, लेकिन जलकुंभी की छाया ने इसे भी घेर लिया है।
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कुंडों में गंदगी से बीमारी फैलने की आशंका
काशी के जलतीर्थों के रूप में प्रसिद्ध कुंडों में जलकुंभियों के अलावा गंदा पानी बहाया जा रहा है। कूड़े और पालीथिन सड़ने से आसपास के मोहल्लों में बीमारी फैलने की आशंका है। आए दिन मछलियों के मरने से लोग सकते में रहते हैं। 200 से अधिक कुंडों वाली काशी में यह संकट नया नहीं है। इससे पहले 150 से अधिक कुंडों-तालाबों को पाट कर कब्जा किया जा चुका है। करीब 66 कुंड-तालाब जो बचे हैं। उनमें जलकुंभियों की भरमार है। कर्णघंटा तालाब, सोनभद्र तालाब, कुरुक्षेत्र तालाब, लक्ष्मी कुंड, शंकुल धारा तालाब के भी जलकुंभियों से भरे हैं।
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कुंडों में जलकुंभियों की समस्या का समाधान कराने के लिए बीएचयू के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। इसके लिए नगर निगम और विशेषज्ञ सर्वे करेंगे। कुछ केमिकल के जरिए इन पर लगाम लगाने के साथ कुंडों का सुंदरीकरण कराया जाएगा।-गौरांग राठी, नगर आयुक्त
कुंडों की सफाई पर प्रतिवर्ष 14 लाख रुपये का खर्च
कुंडों की सफाई पर नगर निगम प्रतिवर्ष 14 लाख रुपये खर्च करता है। यही नहीं कई कुंडों पर स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से श्रमदान भी चल रहा है। लेकिन, जलकुंभियों की संख्या कम नहीं हो रही है। बीते पांच सालों में नगर निगम 50 लाख रुपए से अधिक कुंडों की सफाई पर खर्च कर चुका है, लेकिन हर बार गंदगी और जलकुंभी की समस्या बनी रहती है।