राजनीति: बसपा के पुराने ब्राह्मण समीकरण पर अरुण पाठक ने उठाए सवाल, कहा- मायावती से बनाएं दूरी; होगा अपमान
विश्व हिंदू सेना अध्यक्ष अरुण पाठक ने मायावती पर ब्राह्मण समाज को लेकर पुराने राजनीतिक वादे पूरा न करने का आरोप लगाया। उन्होंने बसपा में अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। पाठक ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ब्राह्मण समाज से मायावती के बयानों को लेकर सतर्क रहने की अपील की।
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विश्व हिंदू सेना के अध्यक्ष और अखिल भारत हिंदू महासभा (युवा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण पाठक ने बसपा सुप्रीमो मायावती और ब्राह्मण समाज के बीच पुराने राजनीतिक समीकरण को लेकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मायावती के दौर में ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है’ जैसे नारों के जरिए ब्राह्मण समाज को बसपा से जोड़ने का प्रयास किया गया था। 2007 में बसपा ने ब्राह्मण-दलित सामाजिक समीकरण के आधार पर बहुमत की सरकार बनाई थी।
अरुण पाठक ने दावा किया कि वह वर्ष 2008 से 2010 तक रोहनिया विधानसभा क्षेत्र में बसपा के कोऑर्डिनेटर रहे। उनके मुताबिक लोकसभा चुनाव में उनके प्रयासों से पार्टी ने तत्कालीन कद्दावर प्रत्याशी को 10 हजार वोट से हराया, जिसके बाद मायावती ने उन्हें रोहनिया के साथ कैंट विधानसभा क्षेत्र की भी जिम्मेदारी दी थी। उन्होंने कहा कि उस दौरान मायावती ने ब्राह्मण नेताओं को लोकसभा चुनाव में टिकट देने की बात कही थी, लेकिन बाद में उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं।
पाठक ने आरोप लगाया कि चुनाव जीतने के बाद बसपा में ब्राह्मण नेताओं के साथ अलग व्यवहार किया गया। उन्होंने दावा किया कि पार्टी में आर्थिक मांगें की जाती थीं और मांग पूरी नहीं करने वालों को अपमानित अथवा निष्कासित किया जाता था। हालांकि ये आरोप अरुण पाठक के व्यक्तिगत दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उन्होंने नहीं दी।
उन्होंने बताया कि करीब पांच साल तक बसपा में रहने के बाद उन्होंने वर्ष 2014 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया। पाठक का आरोप है कि पार्टी से जुड़े रहने के दौरान उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा और बाद में निष्कासित कर दिया गया।
अरुण पाठक ने आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में ब्राह्मण समाज से मायावती के बयानों को लेकर सतर्क रहने की अपील की। उन्होंने आशंका जताई कि सत्ता में आने पर सवर्ण समाज से जुड़े लोगों को एससी/एसटी एक्ट के मामलों का सामना करना पड़ सकता है और जमीनों को लेकर विवाद खड़े हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि बसपा में अपने अनुभव के आधार पर वह ब्राह्मण समाज को अपना राजनीतिक निर्णय सोच-समझकर लेने की सलाह दे रहे हैं।