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डॉ. केदारनाथ सिंह का काशी से था गहरा जुड़ाव, कहते थे- काशी ने बहुत कुछ दिया

Tue, 20 Mar 2018 10:31 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 20 Mar 2018 10:31 AM IST
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poet kedarnath singh has special relation from varanasi
जाने-माने साहित्यकार डॉ. केदारनाथ सिंह - फोटो : twitter
जाऊंगा कहां
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रहूंगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह पड़ा रहूंगा।
किसी पुराने ताखे या संदूक की गंध में छिपा रहूंगा मैं
दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे...। 

मशहूर कवि और जाने-माने साहित्यकार डॉ. केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियां जमीन से उनके जुड़ाव को बताने के लिए पर्याप्त हैं। डॉ. सिंह का काशी से बहुत गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने बीएचयू के हिंदी विभाग से स्नातकोत्तर करने के बाद शोध छात्र के रुप में अध्ययन किया था।

बाद में उदय प्रताप इंटर कॉलेज में शिक्षक के रुप में भी जिम्मेेदारियों का निर्वहन किया है। अपनी साहित्यिक कृतियों में उन्होंने बनारस का खूब उल्लेख किया है। काशी से डॉ. सिंह के जुड़ाव का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि जब उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने कहा था-मैं तो काशी वाला हूं, काशी ने बहुत कुछ दिया है। यह मेरा नहीं, काशी का सम्मान है। अत: कृतज्ञ होकर यह सम्मान स्वीकार करता हूं। 
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 बनारस के साहित्यकारों, कवियों, शिक्षकों को उनका जाना बहुत खल रहा है। उनके निधन की खबर मिली हर कोई स्तब्ध रह गया। उनके जाने से काशी के साहित्य जगत में सूनापन आ गया है। बलिया में जन्म के बाद प्रारंभिक शिक्षा अर्जित करने के बाद वह उदय प्रताप इंटर कॉलेज में अध्यापन करने के बाद यहीं शिक्षक के रुप में भी रहे।
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बीएचयू में 1969 में जब प्रवक्ता के रुप में उनकी नियुक्ति हुई तो वह उसे ठुकरा कर जेएनयू, दिल्ली चले गए। इसके बाद हिंदी विभाग में आयोजित कार्यक्रमों में जब भी उन्हें बुलाया जाता था, आमंत्रण को सहज भाव से स्वीकार करते थे।

डॉ. सिंह के बलिया जिले में स्थित गांव चकिया में एक मकान जरूर है लेकिन वहां कोई नहीं रहता है। कई साल पहले परिवार कोलकाता जाकर बस गया है। परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद वह बलिया आए थे। इस दौरान उन्हें कई स्थानों पर सम्मानित किया गया था।

जीवन परिचय
1934: बलिया के चकिया गांव में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा 
1952: उदय प्रताप इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण
1956: बीएचयू के हिंदी विभाग से स्नातकोत्तर 
1964: बीएचयू के हिंदी विभाग से पीएचडी

बनारस पर जो कविता लिखी, वैसी आज तक किसी ने नहीं लिखी

poet kedarnath singh has special relation from varanasi
kedarnath singh
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. बलिराज पांडेय ने कहा कि बनारस पर जो कविता उन्होंने लिखी, वैसी आज तक किसी दूसरे कवि ने नहीं लिखी। एक-डेढ़ महीने पहले बनारस में ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनके काव्य संग्रह पर नामवर सिंह ने आलोचना लिखी थी। सिंह की कविता से अज्ञेय इतने प्रभावित थे कि तीसरा सप्तक में प्रकाशित किया था। एक कवि के रुप में केदारनाथ सिंह को बड़ी प्रतिष्ठा मिली।

वरिष्ठ आलोचक प्रो. चौथी राम यादव ने कहा कि केदारनाथ सिंह के न रहने से हिंदी कविता की अपूरणीय क्षति हुई है। इसके हिंदी कविता के एक युग का अंत भी माना जा सकता है। केदारनाथ सिंह का जाना बहुत खल रहा है। यह विश्वास नहीं हो रहा है कि वह चले गए। पहले कहानीकार दूधनाथ सिंह और फिर केदारनाथ सिंह का जाना दु:खद है।

वरिष्ठ संस्मरण लेखक प्रो. कुमार पंकज ने कहा कि केदारनाथ सिंह छायावादोत्तर कविता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। उनका गद्य भी उतना ही प्रभावशाली है, जितनी कि कविता। एक जमाने में उनकी किताब कल्पना और छायावाद बहुत लोकप्रिय थी। दो साल पहले हिंदी विभाग में आयोजित एक कार्यक्रम में उनसे मुलाकात हुई थी।

वरिष्ठ समीक्षक  डॉ. देवी प्रसाद कुंवर ने कहा कि बनारस और गांव से उनका जुड़ाव हमेशा बना रहा। जब भी काशी आते, परिचितों से जरूर मिलते थे और स्नेह के साथ आशीष देते थे। उन्होंने गांव के रंगों को अपनी रचनाओं में उतारा। इस कारण वह पाठकों के बेहद करीब थे। उनकी रचनाओं में आम पाठक खुद को देखता था। यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। 

श्रद्धांजलि! केदारनाथ सिंह...बनारस स्तब्ध है...

poet kedarnath singh has special relation from varanasi
2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद आए थे बलिया - फोटो : twitter
जिसका डर था। वही हुआ। मदन कश्यप से पता चला कि हमारे समय के अत्यंत लोकप्रिय कवि और बनारस के अपने कवि केदार नाथ सिंह का दिल्ली के अस्पताल में निधन हो गया। बनारस उनके नाम से हिंदी कविता में अमर था। यहीं से हिंदी में एमए व पीएचडी थे। बनारस पर लिखी उनकी कविता आज भी अमर है। बनारस को अमर कर दिए थे। क्या कहूं! आज हिंदी कविता का लोक-परलोक चला गया। बनारस का  दिल्ली से नाता टूट गया। बूढ़े गड़ेरिये का चेहरा समझने वाला क्षय बोध को हिंदी कविता में गहरे स्तर पर समझने वाला माझी का पुल वाला कवि सृष्टि के भीतर पहुंच गया, जहां से उसकी कविता की आवाज आ रही है!!
उनके पहले संग्रह अभी बिल्कुल अभी की तरह यह दुखद सूचना अभी प्राप्त हुई है। अपनी बतकही के अंदाज में गंभीर बात करने वाले केदार जी भोजपुरी की जिस मजबूत जड़ से जुड़ाव रखते थे, वह अब नहीं रहे, शब्द उनके यहां कम्पते हैं, थरथराते हैं और बहुत दूर की यात्रा करते हैं। उनकी संवेदना बोरसी की आग की तरह आरंभ होती है और फिर पूरी कायनात को अपनी ऊष्मा से उर्जावान बना देती है। अकाल में सारस, जमीन पक रही है और उत्तर कबीर और अन्य कविताओं का भाषा में गहरे मौन का साधक अब जीवन के मौन में चला गया। उनकी लोक सौंदर्य को लक्षित करने वाली कविताओं के सामने ज्ञानपीठ व साहित्य अकादेमी जैसे पुरस्कार भी नतमस्तक थे।
बनारस अपने जिस कवि की उपस्थिति पर नाज़ करता था और जो खुद को त्रिलोचन की परंपरा में बनारस का कवि मानता था, वह अब मौन है। और यह हमारे समय की एक बड़ी क्षति है! बाकी बाद में।
(प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, हिंदी विभाग, बीएचयू की फेसबुक वाल से) 
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