{"_id":"57ddaf9a4f1c1b3c3dd4ac9a","slug":"pinddan-pools-of-losses-for-the-crowd","type":"story","status":"publish","title_hn":"पिंडदान के लिए घाटों से कुंडों तक भीड़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पिंडदान के लिए घाटों से कुंडों तक भीड़
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
Updated Sun, 18 Sep 2016 02:33 AM IST
विज्ञापन
काशी में शनिवार को अपने पितरों को पिंडदान करते लोग।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्वजों की स्मृतियां शनिवार को उनकी पसंद की वस्तुओं के दान के साथ ताजा की गईं। प्रथम श्राद्ध भूमि पिशाच मोचन से लेकर मणिकर्णिका अनादि तीर्थ तक देश-विदेश से पहुंचे वंशजों ने पिंडदान किया। घाटों पर सैकड़ों की तादाद में वंशजों ने एक साथ पिंडदान किया। कहीं लाल वस्त्र में तो कहीं पीले वस्त्रों में वंशजों के समूह नजर आए। पितरों की आत्मा को मोक्ष दिलाने के लिए तमाम लोग बाजे गाजे के साथ गया के लिए भी रवाना हुए।
पिशाच मोचन (बिमल तीर्थ) पर सुबह से ही पिंडदान के लिए भीड़ उमड़ने लगी। कुंड की सीढ़ियों से लेकर प्रेतकुंड के दोनों तरफ लगी तीर्थपुरोहितों की चौकियों तक मेले जैसा माहौल रहा। भीतर के बरामदों में तो जगह-जगह प्रेतबाधा से परेशान लोगों को पुरोहित ब्रह्मदोष से मुक्ति के लिए उपाय कराते रहे। यहां वेदियां, कलश सजाकर ध्वजा, पताका लगाकर त्रिपिंडी श्राद्ध किया गया। ब्राह्मणों के अलावा कौवा, गाय, कुत्ते को पितरों के मन पसंद व्यंजन खिलाए गए।
तीर्थपुरोहित कृष्ण कुमार उपाध्याय ने बताया कि काशी में पिशाच मोचन प्रथम शाद्ध भूमि है। यहां तर्पण-अर्पण और पिंडदान से प्रेत बाधा से मुक्ति मिल जाती है। उधर, मणिकर्णिका घाट पर नेपाली लाल मोहरिया पंडा पं. रविशंकर द्विवेदी, मुकेश द्विवेदी ने पड़ोसी देश नेपाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात से आए हजारों वंशजों का पिंडदान समूहों में कराया। धर्मकूप, पितृकुंड और शीतला घाट, अहिल्याबाई घाट, राजघाट पर भी पिंडदान शुरू हो गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
पिशाच मोचन (बिमल तीर्थ) पर सुबह से ही पिंडदान के लिए भीड़ उमड़ने लगी। कुंड की सीढ़ियों से लेकर प्रेतकुंड के दोनों तरफ लगी तीर्थपुरोहितों की चौकियों तक मेले जैसा माहौल रहा। भीतर के बरामदों में तो जगह-जगह प्रेतबाधा से परेशान लोगों को पुरोहित ब्रह्मदोष से मुक्ति के लिए उपाय कराते रहे। यहां वेदियां, कलश सजाकर ध्वजा, पताका लगाकर त्रिपिंडी श्राद्ध किया गया। ब्राह्मणों के अलावा कौवा, गाय, कुत्ते को पितरों के मन पसंद व्यंजन खिलाए गए।
विज्ञापन
तीर्थपुरोहित कृष्ण कुमार उपाध्याय ने बताया कि काशी में पिशाच मोचन प्रथम शाद्ध भूमि है। यहां तर्पण-अर्पण और पिंडदान से प्रेत बाधा से मुक्ति मिल जाती है। उधर, मणिकर्णिका घाट पर नेपाली लाल मोहरिया पंडा पं. रविशंकर द्विवेदी, मुकेश द्विवेदी ने पड़ोसी देश नेपाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात से आए हजारों वंशजों का पिंडदान समूहों में कराया। धर्मकूप, पितृकुंड और शीतला घाट, अहिल्याबाई घाट, राजघाट पर भी पिंडदान शुरू हो गया।
विज्ञापन