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आम लोगों को आसानी से यकीन नहीं होता कि वे गंगा किनारे हैं, ये रहे कारण
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 26 Feb 2018 03:53 PM IST
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चौंकिए मत, यहां गिर रही है होटलों की गंदगी
- फोटो : अमर उजाला
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भगवान शिव की जटाओं से धरती पर उतरी मोक्षदायिनी गंगा का हाल बाबा भोले की नगरी काशी में बेहाल है। काशी के घाटों से गंगा काफी दूर चली गईं हैं। घाट पड़ताल के तहत आज पढ़ें ललिता घाट से त्रिपुर भैरवी घाट तक का आंखों देखा हाल...
ललिता घाट से आगे की यात्रा का अगला पड़ाव त्रिपुर भैरवी घाट से लेकर मान मंदिर घाट तक रहा। यहां राष्ट्रीय नदी गंगा का हाल देखकर सहसा विश्वास नहीं होता है। घाट की सीढ़ियों से लेकर गंगा तट तक फैली गंदगी, सीढ़ियों से बहता सीवर, पानी में फेंके गए कपड़े और जल में श्रद्धा के रूप में चढ़ाए गए निर्माल्य भी पानी में ही सड़ रहे हैं। रास्ते में पड़ रहे अन्य घाटों के किनारे बने होटलों की गंदगी भी गंगा में ही बहाई जा रही है। इसे देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
रविवार को गंगा को काफी नजदीक से देखा। आदिकेशव घाट से मानमंदिर घाट तक नालों का गंगा में गिरना जारी है। त्रिपुर भैरवी घाट से थोड़ा आगे बढ़ कर मानमंदिर घाट पर गए तो पाया कि मानमंदिर जाने का रास्ता गंदगी से पटा हुआ है।
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दोनों घाटों के बीच श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए बना स्थान यूरिनल में तब्दील हो गया है। कहां पांव रखें, समझ नहीं आता। बचते-बचाते मानमंदिर घाट तक गए तो घाट से गंगा तट तक जहां-जहां नजर पहुंची, गंदगी ही गंदगी नजर आई। नालों के मार्फत मल-मूत्र बदस्तूर गंगा में गिरता मिला। पल भर को सोचना पड़ा, हम गंगा किनारे ही ही तो हैं।
गंगा उस पार तो पूछना ही क्या, वहां तो गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि होटल वाले तो चुपके से गंगा में गंदगी फेंक देेते हैं। मानमंदिर घाट पर मिले गाइड राजकुमार शर्मा, रमेश मल्लाह, राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि आखिर कब ले बनी एसटीपी, केतना कपड़ा बदले क जगह बनी।...अरे काहे वदे घाट पर टायलेट बनल हौ।...अगर बनत हौ त ओकरो निकासी का कौनो रास्ता अबले ना निकलल कुल गंदगिया त गंगा जी में ही जाई...।
ललिता घाट से आगे की यात्रा का अगला पड़ाव त्रिपुर भैरवी घाट से लेकर मान मंदिर घाट तक रहा। यहां राष्ट्रीय नदी गंगा का हाल देखकर सहसा विश्वास नहीं होता है। घाट की सीढ़ियों से लेकर गंगा तट तक फैली गंदगी, सीढ़ियों से बहता सीवर, पानी में फेंके गए कपड़े और जल में श्रद्धा के रूप में चढ़ाए गए निर्माल्य भी पानी में ही सड़ रहे हैं। रास्ते में पड़ रहे अन्य घाटों के किनारे बने होटलों की गंदगी भी गंगा में ही बहाई जा रही है। इसे देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
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रविवार को गंगा को काफी नजदीक से देखा। आदिकेशव घाट से मानमंदिर घाट तक नालों का गंगा में गिरना जारी है। त्रिपुर भैरवी घाट से थोड़ा आगे बढ़ कर मानमंदिर घाट पर गए तो पाया कि मानमंदिर जाने का रास्ता गंदगी से पटा हुआ है।
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दोनों घाटों के बीच श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए बना स्थान यूरिनल में तब्दील हो गया है। कहां पांव रखें, समझ नहीं आता। बचते-बचाते मानमंदिर घाट तक गए तो घाट से गंगा तट तक जहां-जहां नजर पहुंची, गंदगी ही गंदगी नजर आई। नालों के मार्फत मल-मूत्र बदस्तूर गंगा में गिरता मिला। पल भर को सोचना पड़ा, हम गंगा किनारे ही ही तो हैं।
गंगा उस पार तो पूछना ही क्या, वहां तो गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि होटल वाले तो चुपके से गंगा में गंदगी फेंक देेते हैं। मानमंदिर घाट पर मिले गाइड राजकुमार शर्मा, रमेश मल्लाह, राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि आखिर कब ले बनी एसटीपी, केतना कपड़ा बदले क जगह बनी।...अरे काहे वदे घाट पर टायलेट बनल हौ।...अगर बनत हौ त ओकरो निकासी का कौनो रास्ता अबले ना निकलल कुल गंदगिया त गंगा जी में ही जाई...।
राजपूती गौरव का प्रतीक मान महल घाट
गंगा में गिर रही है होटलों की गंदगी
- फोटो : अमर उजाला
पातालपुरी मठ के महंत बालक दास ने कहा कि गंगा के बिना धर्म और सनातन संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह भारत की जीवनधारा है। इस पर संकट खड़ा हो गया है। हालात नहीं बदले तो भारतीय संस्कृति और धर्म पर भी संकट उत्पन्न हो जाएगा। आम जनमानस को इस भयावह संकट को देखते हुए जागरूक होना पड़ेगा। समय रहते हम नहीं चेते तो गंगा को फिर से इतिहास बनते देर नहीं लगेगी।
स्वर्ग से उतरी गंगा फिर से वापस चली जाएंगी। मानव की भौतिक और अर्थवादी नीति इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है। सरकारें हमेशा बदलती हैं लेकिन गंगा की दशा में कोई बदलाव नहीं आया है। यह बेहद चिंता का विषय है।
राजपूती गौरव के प्रतीक मान महल घाट का सोलहवीं शताब्दी में आमेर के राजा मानसिंह ने घाट, महल एवं मंदिर का निर्माण कराया था। घाट धार्मिक सांस्कृतिक महत्व की अपेक्षा विशाल कलात्मक महल एवं इसमें निर्मित नक्षत्र वेधशाला के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। महल मथुरा के गोवर्धन मंदिर का स्वरूप एवं उत्तर मध्यकालीन राजस्थानी राजपूत दुर्ग शैली का उदाहरण है।
17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मानसिंह के वंशज राजा सवाई जय सिंह ने ग्रह नक्षत्रों की सटीक जानकारी देने वाली नक्षत्र वेधशाला का निर्माण कराया था। इसका नक्शा सवाई जय सिंह के प्रसिद्ध ज्योतिषी समरथ जगन्नाथ ने बनाया था। वेधशाला में सम्राट यंत्र, लघु सम्राट यंत्र, दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दिशांग एवं चक्र यंत्र हैं।
गंगा मैया को पियरी चढ़ाई, दूर न जाने की प्रार्थना
अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज की छात्राओं ने किया अस्सी घाट पर पूजन किया
- फोटो : अमर उजाला
घाटों से दूर जा रही गंगा मां को मनाने और लोगों को जागरूक करने के लिए रविवार सुबह अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज की छात्राओं ने अस्सी घाट पर गंगा को पियरी चढ़ाई। साथ ही दूर न जाने की प्रार्थना की। इस दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों को जागरूक किया और समझाया कि काशी से गंगा लुप्त हुई तो भोलेनाथ को क्या जवाब देंगे?
पियरी चढ़ाने के पूर्व महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कुमकुम मालवीय व आचार्य बब्बन तिवारी ने छात्राओं के साथ विधि-विधान से गंगा मैया का पूजन-अर्चन कर गंगा मैया की आरती उतारी। शंखनाद कर गंगा बचाओ अभियान की शुरुआत की।
छात्राओं के साथ विदेशियों ने भी मिलकर गंगा मैया को पियरी चढ़ाई।
पियरी चढ़ाने के पूर्व महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कुमकुम मालवीय व आचार्य बब्बन तिवारी ने छात्राओं के साथ विधि-विधान से गंगा मैया का पूजन-अर्चन कर गंगा मैया की आरती उतारी। शंखनाद कर गंगा बचाओ अभियान की शुरुआत की।
छात्राओं के साथ विदेशियों ने भी मिलकर गंगा मैया को पियरी चढ़ाई।