होली पर करें प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल, करते हैं औषधि का काम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
होली के मजे को मिलावटी और केमिकल युक्त रंगो के चलते किरकिरा हो जाता है। एक दूसरे को खुशियों के रंग में रंगने के चक्कर में ऐसे रंग आंख और त्वचा के लिए नुकसान पहुंचाने हैं।ऐसे में लोग थोड़ा दिमाग से काम ले तो होली उनके लिए हर तरह से खुशिमय और फायदेमंद रहेगा।
केमिकल युक्त और मिलावटी रंगो के अभिशाप से भी मुक्ति मिल जाएगी। पर्यावरण विदों का मानना है कि प्रकृति के सानिध्य में प्राकृतिक रंग गुलाल का इस्तेमाल करे तो हर तरह से फायदा नजर आएगा।
केएनपीजी कालेज के वनस्पति विभागाध्यक्ष डॉ.कमाल अहमद सिद्दी की कहते हैं कि प्राकृतिक रंग औषधि का काम करते हैं। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से जहां त्वचा कांतिमय होगी, आंखों के लिए नुकसान नहीं करेगा। शरीर का आलस्य, सर्दी, एलर्जी आदि से राहत मिलेगी और प्रति रोधक क्षमता भी बढ़ेगी।
प्राकृतिक रंगों के स्रोत में बताया कि चुकंदर,अ नार, गाजर, गुड़हल, टेसूपलास, गेंदा फूल, धनिया, पालक से प्राकृतिक रंग प्राप्त कर सकते हैं। लाल गुलाब की पंखुड़ियों में चंदन मिलाकर पाउडर, पेस्ट या लिक्विड बनाएं।
इससे स्कीन पर चमक आती है,चुकंदर अना र और गाजर के रंगो से सेहत और खूबसूरती दोनों निखरती है। बताया कि होली का महत्व प्राकृतिक रंगो से अधिक होता है। पीले रंग के लिए गेंदा फूल की पंखुड़ियां पीस लें, गाढ़ा रंग करना हो तो हल्दी मिला लें। वहीं इसमें बेसन मिलाने पर अबीर का काम करेंगा।
केमिकल युक्त और मिलावटी रंगो के बारे में जिले के महराजा चेतसिंह जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ.पृथ्वीराज का कहना है कि त्वचा और आंख के लिए नुकसानदायक होता है।
इसलिए जितना हो सके ऐसे रंगो से होली न खेलें। क्योंकि इन रंगो से त्वचा में एलर्जी, शरीर में खुजली और आंखों में पड़ जाने पर एग्जिमा समेत अन्य परेशानियां होती हैं। ऐसे रंग किसी को लगाए या दूसरा कोई लगाए तो ध्यान रखे कि संवेदन शील जगह न लगाए। बताया कि आंख में रंग चला जाए तो फौरन साफ पानी से धुले, आराम न हो तो चिकित्सक के पास जाकर दि खाए।