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प्रवासी अपनी अगली पीढ़ी को वतन की आबोहवा से करा रहें रुबरू

Wed, 23 Jan 2019 10:16 AM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Wed, 23 Jan 2019 10:16 AM IST
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NRI give glimpse of motherland to their next genration
varansi - फोटो : अमर उजाला
अपने वतन लौटने की खुशी और अपनी मिट्टी से जुड़ने का एहसास खुद में ही बेहद सुखद होता है। खासकर तब जब हमें यह पता चले कि कभी हमारे पूर्वज देश के इस गांव में पले बढ़े हो। कुछ ऐसी ही झलकियां देखने को मिली वाराणसी के प्रवासी भारतीय सम्मेलन में।
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जहां कोई अपनी अगली पीढ़ी को अपने पुरखों से रुबरू तो कोई यहां की संस्कृति को आत्मसात करना चाहता है। मॉरीशस से आए चैतानंद ऋषि झीगन के परदादा झीगन सिंह 1864 में मात्र 16 साल की उम्र में बतौर गिरमिटिया मजदूर मॉरीशस गए थे। उनकी चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि चैतानंद बड़े होते ही अपने पुरखों की जड़े तलाशने लगे।

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कई भारत यात्राओं के बाद उन्हें 2009 में पता चला कि उनके पूर्वज मिर्जापुर के चांदपुर गांव के हैं। इसके बाद वे तीन बार अपने पैतृक गांव जा चुके हैं, लेकिन ज्यादा वक्त बिताने का मौका नहीं मिला। प्रवासी सम्मेलन में भाग लेने आए चैतानंद कार्यक्रम के बाद अपने पैतृक गांव में वक्त बिताएंगे।

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पूर्वजों की भूमि की तलाश में अपने अनुभवों पर उन्होंने किताब भी लिखी है, जिसे उन्होंने ‘अनटैंगलिंग द नॉट’ नाम दिया है। चैतानंद अपने साथ अपनी बेटी को भी अपने पुरखों की धरती दिखाने लाए हैं। काशी आतिथ्य के तहत वे सुसुवाही स्थित मनोरथपुरी कॉलोनी में ऊषा त्रिपाठी के घर में ठहरे हैं। 

NRI give glimpse of motherland to their next genration
varansi - फोटो : अमर उजाला
15 साल से कनाडा के लीगल प्रोफेशनल के तौर पर काम कर रहे प्रवासी नरेश चंद्रा कहते हैं कि यहां से हम जो अनुभव लेकर जाएंगे, वह दुनिया के किसी भी कोने में जाने से नहीं मिलता। काशी की परंपरा और संस्कृति के साथ कुंभ के अध्यात्म का दर्शन मेरे लिए खास होगा।

इस बार ये मौका खो देता तो शायद फिर ये अविस्मरणीय पल कभी नहीं मिलते। इनके दोस्त राकेश पटेल का कहना है कि सामाजिक और सांस्कृतिक तानाबाना ही यहां की पहचान है, जिसे मैं इन तीन दिनों में जीना चाहता हूं और यहां से सुखद यादें साथ ले जाना हूं। 

NRI give glimpse of motherland to their next genration
varansi - फोटो : अमर उजाला
फ्रांस से अपनी बेटी को यहां की संस्कृति से परिचित कराने हिना पटेल आई हैं। इनकी बेटी हेमानी पटेल का कहना है कि इंडिया आकर यहां के रीति रिवाजों, परंपराओं से जुड़ना अच्छा लगता है।

 

इनके साथ आईं ज्योत्सना देसाई कहती हैं कि हिंदुस्तान जन्मभूमि है और फ्रांस कर्मभूमि। चूंकि वहां रहते 35 साल हो गए, इसलिए उससे जुड़ाव है, लेकिन हिंदुस्तान दिल में बसता है।

 

दुबई से आए धर्मलिंग भास्कर भी खुद को खुशकिस्मत मानते हैं। रामेश्वरम में उनकी जड़ें हैं। कहते हैं द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक काशी और रामेश्वरम के बारे में क्या बताना। भगवान शिव की ये नगरी अलौकिक है। भास्कर दुबई में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया संस्था के जुड़े हैं।

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