प्रवासी अपनी अगली पीढ़ी को वतन की आबोहवा से करा रहें रुबरू
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जहां कोई अपनी अगली पीढ़ी को अपने पुरखों से रुबरू तो कोई यहां की संस्कृति को आत्मसात करना चाहता है। मॉरीशस से आए चैतानंद ऋषि झीगन के परदादा झीगन सिंह 1864 में मात्र 16 साल की उम्र में बतौर गिरमिटिया मजदूर मॉरीशस गए थे। उनकी चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि चैतानंद बड़े होते ही अपने पुरखों की जड़े तलाशने लगे।
कई भारत यात्राओं के बाद उन्हें 2009 में पता चला कि उनके पूर्वज मिर्जापुर के चांदपुर गांव के हैं। इसके बाद वे तीन बार अपने पैतृक गांव जा चुके हैं, लेकिन ज्यादा वक्त बिताने का मौका नहीं मिला। प्रवासी सम्मेलन में भाग लेने आए चैतानंद कार्यक्रम के बाद अपने पैतृक गांव में वक्त बिताएंगे।
पूर्वजों की भूमि की तलाश में अपने अनुभवों पर उन्होंने किताब भी लिखी है, जिसे उन्होंने ‘अनटैंगलिंग द नॉट’ नाम दिया है। चैतानंद अपने साथ अपनी बेटी को भी अपने पुरखों की धरती दिखाने लाए हैं। काशी आतिथ्य के तहत वे सुसुवाही स्थित मनोरथपुरी कॉलोनी में ऊषा त्रिपाठी के घर में ठहरे हैं।
इस बार ये मौका खो देता तो शायद फिर ये अविस्मरणीय पल कभी नहीं मिलते। इनके दोस्त राकेश पटेल का कहना है कि सामाजिक और सांस्कृतिक तानाबाना ही यहां की पहचान है, जिसे मैं इन तीन दिनों में जीना चाहता हूं और यहां से सुखद यादें साथ ले जाना हूं।
इनके साथ आईं ज्योत्सना देसाई कहती हैं कि हिंदुस्तान जन्मभूमि है और फ्रांस कर्मभूमि। चूंकि वहां रहते 35 साल हो गए, इसलिए उससे जुड़ाव है, लेकिन हिंदुस्तान दिल में बसता है।
दुबई से आए धर्मलिंग भास्कर भी खुद को खुशकिस्मत मानते हैं। रामेश्वरम में उनकी जड़ें हैं। कहते हैं द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक काशी और रामेश्वरम के बारे में क्या बताना। भगवान शिव की ये नगरी अलौकिक है। भास्कर दुबई में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया संस्था के जुड़े हैं।