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पशुओं की बरामदगी-सुपुर्दगी में पुलिस का बड़ा ‘खेल’ उजागर

Mon, 15 May 2017 10:45 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Mon, 15 May 2017 10:45 AM IST
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no any records of animals who caught or submited by police
लंका पुलिस ने 13 साल में बरामद किए गए 2700 पशु, सौंपे किसे पता नहीं - फोटो : demo
पशुओं को बरामदगी और इनकी सुपुर्दगी में पुलिस का बड़ा ‘खेल’ उजागर हुआ है। पशु तस्करों से बरामद पशुओं को किसकी सुपुर्दगी में दिया गया और पशु अब किस हाल में हैं, पुलिस के पास इसका ब्यौरा ही नहीं है। सबसे बुरा हाल लंका पुलिस का है।
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लंका पुलिस ने 2001 से 2014 तक 2700 पशुओं को बरामद तो किया लेकिन उन्हें किस संस्था को दिया, इसकी जानकारी उसने नहीं दी है। इसका खुलासा परिवहन बार संघ के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश कुमार सिंह को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से हुआ है। 
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शिवपुर निवासी अधिवक्ता सिंह ने 13 जनवरी, 2015 को डीआईजी वाराणसी से जन सूचना अधिकार के तहत पशुआें की बरामदगी एवं सुपुर्दगी से संबंधित सूचना मांगी थी। पुलिस ने इसका जवाब देने में खूब आनाकानी की। कई बार रिमाइंडर दिया गया लेकिन जवाब नहीं मिला।
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वाराणसी में 25 अप्रैल को राज्य सूचना आयुक्त को विभिन्न अपीलों पर सुनवाई करनी थी। सिंह राज्य सूचना आयुक्त से शिकायत करने की तैयारी में थे कि 22 अप्रैल को उन्हें एसएसपी वाराणसी की ओर से जवाब भेजा गया। जवाब में जिले भर के थानों में बरामद पशुओं का ब्यौरा मुकदमा नंबर के साथ दिया गया।

एसएसपी की ओर से लंका पुलिस का डिटेल भी दिया गया। किस दिन कितने पशु बरामद किए गए और मुकदमा नंबर क्या है, इसका विवरण तो है लेकिन 2001 से 2014 तक 103 मुकदमों से संबंधित बरामद 2700 पशुओं का पुलिस ने क्या किया, इसका उल्लेख नहीं है।

वहीं जंसा, रोहनिया और लंका में विभिन्न मुकदमों में बरामद पशुओं की वर्तमान स्थिति का विवरण भी पुलिस ने नहीं दिया है। यदि पशुओं की मौत हो गई तो मुकदमे में मेडिकल रिपोर्ट लगानी होती है लेकिन पुलिस के पास मेडिकल रिपोर्ट नहीं है।

सिंह ने लंका थाने में बरामद पशुओं के संबंध में राज्य सूचना आयुक्त से फिर जानकारी मांगी है। 

वाराणसी होते हुए पशुओं को ले जाते हैं पश्चिम बंगाल

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ट्रक से कंटेनर तक में पशुओं को भरकर ले जाया जाता है - फोटो : demo pic
इलाहाबाद मार्ग की ओर से पशु लदे वाहन वाराणसी सीमा में मिर्जामुराद, लंका और रामनगर होते हुए चंदौली की सीमा में जाते हैं। सैयदराजा होेते हुए यह वाहन बिहार और फिर पश्चिम बंगाल तक ले जाए जाते हैं। यहां पशुओं का वध कर उनके मीट की सप्लाई खाड़ी देशों में की जाती है।

ट्रक से कंटेनर तक में पशुओं को भरकर ले जाया जाता है। पशु तस्करी की वजह से ही हाईवे के ये थाने से मोटी कमाई का जरिया बने हुए हैं। अफसरों की सख्ती के बाद अगर चेकिंग की जाती है तो सबसे ज्यादा बरामदगी डाफी के पास से होती है।
आशंका है कि बरामदगी दिखाने के बाद ये पशु फिर से तस्करों के हवाले कर दिए गए हैं।
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