फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Nndi drizzling Brsele not badariya ..

ननदी रिमझिम बरसेले बदरिया ना..

Mon, 08 Aug 2016 02:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 08 Aug 2016 02:16 AM IST
विज्ञापन
लोक गायकी के अंदाज से संगीत प्रेमियों को लुभाने वाले दीपक त्रिपाठी का कहना है कि सावन को महसूस करने के लिए रिमझिम बूंदें ही नहीं, कजरी की फुहार भी जरूरी है।  कजरी पूर्वांचल की ऐसी लोक विधा है, जिसको सुनने और सुनाने वाला पूरी तरह से सावनी फुहार में भींग जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कजरी प्रेम-विरह पर आधारित है। गांव-घर में अकेली रहने वाली स्त्रियां बरसात के मौसम में अपनी विरह वेदना और अकेलेपन की व्यथा कजरी के जरिए व्यक्त करती हैं। सावन और भादों के महीने चाहे जितनी शीतलता और राहत लेकर आएं लेकिन जिनके पति कमाने के लिए परदेश गए होते हैं उन्हें सावन की पुरवाई शीतलता नहीं, विरह वेदना की अग्नि में झुलझाकर रख देती हैं। कजरी बहुत ही पारंपरिक लोक गायन विधा है। इसे कवियों, शायरों को भी लुभाया है।-अमीर खुसरो ने लिखा है-अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया..।-अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की एक रचना -झूला किन डारो रे अमरैया-भी बेहद ही लोकप्रिय है। नीक सैया बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया...। कजरी की असली आत्मा पारंपरिकता में ही बसती है। इसका आनंद ही अलग है। विरह कजरी के भावों में इस कदर प्रगट होता है-घटा घेरले बा घनघोर, बिजुरी चमके चारो ओर ननदी रिमझिम-रिमझिम बरसेले बदरिया ना..। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed