National Mango Day 2022: विदेशी जुबान पर भी बनारसी लंगड़ा आम के स्वाद का जादू, हर साल निर्यात सौ टन से ऊपर
आम की चाहें कितनी भी प्रजातियां बाजार में आ रही हों लेकिन बनारसी लंगड़े की तो बात ही अलग है। ब्रांड बनारस के रूप में इसका स्वाद विदेशी जबान पर भी चढ़ चुका है। यही कारण है कि बनारसी लंगड़े आम का हर साल निर्यात सौ टन से ऊपर है।
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काशी कबहु न छोड़िए विश्वनाथ का धाम, मरने पर गंगा मिले जियते लंगड़ा आम...। काशी में यह कहावत जितनी मशहूर है उतना ही लंगड़ा आम का स्वाद। शिव की नगरी काशी में लंगड़ा आम का अलग ही स्थान है। भगवान शिव के भोग के रूप में अर्पित किए जाने वाले आम का स्वाद ऐसा है कि एक बार जिसने भी चखा वह इसके स्वाद का दीवाना हो गया।
अपनी खुशबू और स्वाद से लोगों की पसंद बने लंगड़ा आम की मजबूत जड़ें कहीं और नहीं बल्कि काशी से ही जुड़ी हैं। यह आम अब आम नहीं बेहद खास आम हो चुका है। आम की चाहें कितनी भी प्रजातियां बाजार में आ रही हों लेकिन बनारसी लंगड़े की तो बात ही अलग है। ब्रांड बनारस के रूप में इसका स्वाद विदेशी जबान पर भी चढ़ चुका है।
यही कारण है कि बनारसी लंगड़े आम का हर साल निर्यात सौ टन से ऊपर है। फलों के राजा की खासियत ही कुछ ऐसी है कि हर साल 22 जुलाई को राष्ट्रीय आम दिवस मनाया जाता है। बनारस से निकलकर लंगड़ा आम अब देश-विदेश में लोगों की पहली पसंद बन चुका है।
जब भी बनारसी लंगड़ा आम की बात की जाती है तो कचहरी स्थित स्टेट बैंक परिसर में मौजूद मातृ पेड़ (मदर ट्री) की चर्चा करना लोग कभी नहीं भूलते हैं। इसी पेड़ से लंगड़ा आम के नए-नए पौधे भी तैयार किए गए हैं। फलों का राजा कहे जाने वाले आम खाने की लोगों की दिलचस्पी का ही असर है कि अब साल दर साल इसका उत्पादन भी बढ़ता जा रहा है।
सुगंध-मिठास का हर कोई है मुरीद
बनारसी लंगड़े का नाम सुनते ही बहुत से लोगों के मुंह में पानी भर आता है। हो भी क्यों नहीं सामान्य आम से इसका स्वाद सबसे अलग रहता है। इसके सुगंध और मिठास की वजह से ही इसका मुरीद हर कोई है। पतला छिलका और गुठली होने के साथ ही इसमें रेशा भी होता है।
इन दिनाें बाजार में भी लोग लंगड़ा आम की मांग अधिक कर रहे हैं। जहां तक मदर ट्री की बात है तो पिछले साल वन विभाग की ओर से इस मातृ पेड़ से 100 पौधे कलम विधि से तैयार किए गए जिसमें से 50 ही सुरक्षित बचे हैं। जिसे कुछ चुनिंदा जगहों पर लगाया जाएगा।
प्रभागीय वनाधिकारी महावीर कौजालगी ने बताया कि पिछले साल पहली बार बनारसी लंगड़ा की पीढ़ी बढ़ाने के लिए 100 पौधे तैयार किए गए थे, जिसमें 50 पौधे सुरक्षित बचे हैं, जिन्हे बाबतपुर की नर्सरी में पिछले एक साल से तैयार किया जा रहा है। अगले दो साल बाद किसी सुरक्षित जगह लगाया जाएगा।
काशी नरेश भी रहे साक्षी
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत कुलपति तिवारी बताते हैं कि स्वाद के लिए मशहूर बनारसी लंगड़ा आम का मातृ पेड़ आज जहां मौजूद है, वहां एक जमाने में बगीचा हुआ करता था। जिसकी रोचक कहानी काशी नरेश परिवार से भी जुड़ी है।
राजा को पता चला कि कचहरी के पास लंगड़ा आम का बगीचा है, जिसकी रखवाली एक पुजारी करते हैं। राजा वहां पहुंचे और पुजारी से आम की कलम देने का आग्रह किया। पुजारी ने पहले उन्हें कलम देने से मना कर दिया था। बाद में पुजारी खुद राजमहल गए और काशी नरेश को आम की कलम भेंट की।