फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Nalanda university knowledge preserved by translating Tibetan religious scriptures into Sanskrit

Varanasi: काशी में तिब्बती भाषा के 4567 धर्मग्रंथों का हो रहा है संस्कृत में अनुवाद, संजोई जा रही धरोहर

Tue, 12 Dec 2023 06:14 PM IST
प्रगति चंद आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: प्रगति चंद Updated Tue, 12 Dec 2023 06:14 PM IST
सार

केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान ने कंग्यूर और तंग्यूर के 4567 धर्मग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद का बीड़ा उठाया है। तथागत की उपदेश स्थली से एक बार फिर देश को भारतीय ज्ञान का नया प्रकाश मिलेगा।
 

विज्ञापन
Nalanda university knowledge preserved by translating Tibetan religious scriptures into Sanskrit
तिब्बती भाषा के 4567 धर्मग्रंथों का हो रहा है संस्कृत में अनुवाद - फोटो : संवाद

विस्तार

बख्तियार खिलजी के आक्रमण में नष्ट हो चुके नालंदा विश्वविद्यालय की अथाह ज्ञान राशि काशी में संरक्षित हो रही है। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान दुर्लभ बौद्ध ग्रंथों के साथ भारतीय आचार्यों के ज्ञान को फिर से देश और दुनिया के सामने लाने की पहल कर रहा है। संस्थान ने कंग्यूर और तंग्यूर के 4567 धर्मग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद का बीड़ा उठाया है। तथागत की उपदेश स्थली से एक बार फिर देश को भारतीय ज्ञान का नया प्रकाश मिलेगा।

विज्ञापन


केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के शोध संकाय में 80 के दशक से तिब्बती धर्मग्रंथों के अनुवाद, शोध और शब्दकोश तैयार करने का काम चल रहा है। संस्थान के शांतरक्षित पुस्तकालय में कंग्यूर और तंग्यूर धर्मग्रंथों का संकलन उपलब्ध है। 43 सालों में अभी तक तिब्बत के कंग्यूर और तंग्यूर के 4567 धर्मग्रंथों में से एक चौथाई का अनुवाद संस्कृत और हिंदी में हो चुका है। इसके 50 से अधिक संस्करण का प्रकाशन भी हो चुका है। कंग्यूर वह है जिसमें भगवान बुद्ध के संदेश हैं और तंग्यूर वह धर्मग्रंथ हैं जिसे भारतीय विद्वानों ने बुद्ध की वाणी को आधार बनाकर रचा है। कंग्यूर में 1108 और तंग्यूर में 3459 धर्मग्रंथ हैं।
विज्ञापन


कुलसचिव डॉ. सुनीता चंद्रा ने बताया कि तिब्बती संस्थान की स्थापना का उद्देश्य ही तिब्बत में मौजूद भारतीय ज्ञान व ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद करना था। इसके लिए शोध संकाय में शोध विभाग, अनुवाद विभाग और कोश विभाग स्थापित किया गया। तिब्बत के धर्मग्रंथों में जो भी ज्ञानराशि संरक्षित है, उसे फिर से भारत को लौटाने के उद्देश्य से यह पहल की जा रही है। तिब्बती भाषा में संरक्षित भारतीय ज्ञान को आमजन तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। धर्मग्रंथों के अनुवाद के साथ ही उनके डिजिटलाइजेशन पर भी काम हो रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


1985 से हुई शुरुआत
दुर्लभ बौद्ध ग्रंथ शोध योजना के प्रभारी टीआर शाशनी ने बताया कि दुर्लभ बौद्ध ग्रंथों के शोध व प्रकाशन की योजना एक नवंबर 1985 में आरंभ हुई। शुरुआत में इसे पांच महीने के पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया लेकिन बाद में पंचवर्षीय योजना के रूप में संचालित किया गया। बौद्ध पांडुलिपियां भुजिमोल, प्राचीन नेवारी, रंजना, कुटिल, वर्तुल, मागधी, प्राचीन देवनागरी आदि लिपियों में मिलती हैं।

ऐसे होता है प्रकाशन
प्रभारी टीआर शाशनी का कहना है कि परम पावन दलाईलामा ने कहा था हमारे पास मौजूद सभी ज्ञान का स्रोत नालंदा से आया है। ऐसे में तिब्बती धर्मग्रंथों के अनुवाद की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। पांडुलिपियों के संकलन, वर्गीकरण के बाद इसे किसी प्रामाणिक एवं मौलिक संस्करण के आधार पर प्राचीन देवनागरी लिपि में अनुवाद करके कंप्यूटर में डाटा फीड किया जाता है। इसके बाद संस्कृत पांडुलिपियों से पाठों के संकलन के बाद संकलित पाठ का भोट पाठ के साथ मिलान करने के बाद संस्कृत में अनुवाद किया जाता है।

तिब्बती भाषा में संरक्षित है भारत का ज्ञान
तिब्बती संस्थान के दीपांकर त्रिपाठी ने बताया कि मठ और मंदिरों में सात से 13वीं शताब्दी के बीच तिब्बत के राजा की देखरेख में बौद्ध और भारतीय ग्रंथों का अनुवाद शुरू हुआ। उस दौर में नालंदा संपूर्ण विश्व का पहला विश्वविद्यालय हुआ करता था। भारत से संस्कृत के विद्वानों को तिब्बत आमंत्रित किया गया और उनकी मदद से भारतीय ज्ञान को तिब्बती भाषा में संरक्षित किया गया। इसमें भगवान बुद्ध के संदेश के साथ ही भारतीय ग्रंथों का भी अनुवाद किया गया। इसे और सरल बनाने के लिए तिब्बती भाषा को संस्कृत की तरह ही विकसित किया गया।

कंग्यूर के ग्रंथ: विनय, प्रज्ञा पारमिता, अवंतसक, रत्नकूट, दो सूत्र, प्राचीन तंत्र, कालचक्र तंत्र, धारणी तंत्र
तंग्यूर के ग्रंथ : तंत्र, प्रज्ञा पारमिता, मध्यमक, सूत्र व्याख्या, विज्ञानवाद,अभिधर्म, विनय, इतिहास, प्रमाण, चिकित्सा शास्त्र, शिल्प विद्या इत्यादि।


पुस्तकालय में हैं एक लाख से अधिक पुस्तकें
तिब्बती संस्थान के शांतरक्षित पुस्तकालय में लगभग 1,20,215 मुद्रित पुस्तकें, कैलीग्राफ और शैक्षणिक दस्तावेज हैं। 27 हजार डिजिटल दस्तावेज और 8484 दस्तावेज माइक्रोचिप और फिल्मों में संकलित हैं।

दुनिया का पहला विश्वविद्यालय था नालंदा
427 ईस्वी में स्थापित, नालंदा को दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है। नालंदा प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा केंद्र में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के और अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग और धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाए जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र व चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed