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एक अंधेरी गुफा का अनजान रहस्य, रोंगटे खड़ा करने वाला यात्रा वृतांत

Tue, 20 Jun 2017 02:26 PM IST
amarujala.com- Written by: अनुपम निशांत
amarujala.com- Written by: अनुपम निशांत Updated Tue, 20 Jun 2017 02:26 PM IST
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Mystery of a dark cave in Mirzapur, read traveler experience
मिर्जापुर की रहस्यमयी गुफा और इसी पहाड़ी पर बनाए गए भित्तिचित्र - फोटो : अनुपम निशांत

यह कोई काल्पनिक तिलिस्मी कथा नहीं बल्कि आँखों देखा एक ऐसा सच है जिसे जानकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। एक अँधेरी सुरंग के भीतर जाने की सच्ची घटना की ऐसी दास्तान जिसे पढ़कर कुछ क्षण के लिए आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। रहस्य और रोमांच की ये दास्तान आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि आखिर हजारों साल से क्या छिपा है इस रहस्यमयी सुरंग में...।

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मिर्जापुर जिले में प्राचीन विंध्य पर्वत श्रृंखला की गोद में आदिम मनुष्य पला-बढ़ा और सभ्यता की ओर कदम बढ़ाए। इन पहाड़ों में रहस्य और रोमांच के हजारों किस्से आज भी ज़िंदा हैं। साथ ही ज़िंदा हैं इन किस्सों को आधार देने वाले कई प्रमाण। रहस्यों की तमाम गाथाओं की एक कड़ी है ये अँधेरी सुरंग।
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यह गुफा इतनी रहस्यमयी है कि इसकी रक्षा आज भी एक अजगर करता है। लोक मान्यता है कि ये सुरंग एक गुप्त मार्ग है उस विशाल कक्ष तक पहुंचने का जिसमें एक ऋषि हजारों साल से तपस्या में लीन हैं। साथ ही यहाँ स्वर्णाभूषणों और रत्नों का अद्भुत खजाना भी हजारों साल से तिलिस्म में बंद कर सुरक्षित रखा गया है।
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हालांकि आज की तारीख़ में इस बारे में जानने और खोजने का साहस कोई नहीं करता।  स्थानीय इतिहास की पुरानी किताबों और बुजुर्गों से इस जगह के बारे में पता चला तो मैंने इस सुरंग का रहस्य जानने की कोशिश की। हालांकि इस खोज यात्रा में जान का जोखिम ज्यादा था और कुछ हासिल होने की गुंजाईश कम..। फिर भी इस अनजान सफ़र पर निकल पड़ा।

पहाड़ के अंदर बने हैं विशाल कमरे और पत्‍थर के दो द्वारपाल

Mystery of a dark cave in Mirzapur, read traveler experience
सुरंग के अंदर से बाहर का नजारा और गुफा के अंदर बढ़ने का रास्ता - फोटो : अनुपम निशांत

ये यादगार वाकया करीब 12 साल पुराना है। तब मैं प्राचीन भित्तिचित्रों और कुछ अन्य पुरावशेषों की खोज में अपने इलाके (चुनार-अहरौरा) के जंगलों-पहाड़ों की ख़ाक छानता फिर रहा था। बीएचयू में एमए पत्रकारिता का विद्यार्थी था।

सुबह घर से निकलता तो शाम ढले हर दिन कुछ नई अचंभित कर देने वाले दृश्यों की यादें और पत्थरों पर चित्र भाषा में लिखे कई किस्से साथ लेकर ही लौटता। साथ में एक डायरी, कुछ नक्शे, हैंडीकैम, स्टिल कैमरा, पानी की बोतल, लोहे की रॉड और एक चाकू जरूर होता।

इन जंगलों में आज भी तेंदुए, भालू, अजगर और भेड़ियों के हमले का खतरा हर वक्त सिर पर मंडराता रहता है। विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई मेरी जानकारी के मुताबिक इस पहाड़ी के भीतर कोई सभागार था।

क्यों था, कब से था और क्या था इस सभागार में, इसका जवाब खोजने मुझसे पहले उसी इलाके के कोई सज्जन मुझसे करीब 60 साल पहले वहां पहुंचे थे। गौर करने की बात है कि पहाड़ी के भीतर यानि पहाड़ महज आवरण था उस रहस्य का...। का पहाड़ के भीतर विशाल कमरे थे।

उन्होंने इस पहाड़ में कोई मार्ग ढूंढ निकाला और सभागार के द्वार तक पहुंचे तो पाषाण के दो सिपाही हाथों में तलवार लिए खड़े मिले। द्वार बन्द था। सामने कुछ ऐसे निशान से होकर गुजरना था कि सही जगह कदम पड़े तो द्वार खुला...और गलत जगह पैर पड़ा नहीं कि द्वारपालों के हाथ की तलवार सीधे गर्दन पर गिरती और तत्क्षण ही गर्दन धड़ से अलग....। 

मंदिर के महंत बोले, कुछ तो छिपा है इस पहाड़ी के अंदर

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पुजारी जी का बेटा व पुजारी जी - फोटो : अनुपम निशांत

बेचारे वे क्या करते..। जान प्यारी थी सो वापस लौट आए और रहस्य रहस्य ही बना रहा। पहाड़ पर पहुंचा। चोटी पर एक सिद्धपीठ भी है। बड़ी दूर-दूर तक मान्यता है उसकी। वहां महंत, उनके पुत्र और कुछ श्रद्धालु भी थे। मैं किसी को ये भनक तक नहीं लगने देना चाहता था कि मेरा मकसद क्या है।

बुजुर्ग महंत जी से मंदिर के अतीत-वर्तमान पर देर तक चर्चा हुई। उन्होंने भी स्वीकार किया कि इस पहाड़ के भीतर कुछ तो है...। मैंने उनसे विदा ली और चल पड़ा वो रास्ता खोजने जो मुझे उस 'कुछ है' तक पहुंचा सकता था। उनके सुपुत्र भी साथ हो लिए।

करीब 400 मीटर ऊंची पहाड़ी के तीन चक्कर काटे तब जाकर एक बेहद संकरी सी सुरंगनुमा जगह दिखी। मैंने मन ही मन कहा - यही है। अंदर झांककर देखने की कोशिश नाकाम रही। मैंने कंधे से बैग उतारा। हैंडीकैम हाथ में लिया और चाकू जेब में। मेरी तैयारी देख साथ खड़े महाशय आश्चर्य में पड़े।

बोले - क्या हुआ कहाँ जा रहे हैं..? मैंने उनका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा - आप निश्चिन्त रहें। मैं भीतर जा रहा हूं। मैंने कहा - जब तक मेरी आवाज़ सुनाई दे, आप बाहर रह सकते हैं। जब आवाज़ सुनाई देनी बन्द हो जाए या मेरी कोई भी चीख आप तक न पहुंचे तो आप बेहिचक लौट जाइएगा और इस पते पर मेरे भीतर होने की सूचना जरूर पहुंचा दीजिएगा...।

ये कहते हुए मैंने कागज का एक टुकड़ा उनकी जेब में डाल दिया। उस पर मेरे घर का पता और फोन नम्बर थे। सुरंग शुरुआत में ही इतनी संकरी थी कि बैठकर भी भीतर घुसना सम्भव नहीं था। मैंने जैकेट उतारी और लगभग लेटकर भीतर घुसने लगा। करीब पांच मीटर अंदर पहुंचा तो बैठने लायक जगह थी। लेकिन घुप्प अंधेरा...।
 

पहाड़ के अंदर दिखा गलियारानुमा रास्ता, तभी अचानक हुई हलचल

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गुफा के बाहर का नजारा - फोटो : अमर उजाला

हाथ को हाथ नहीं सूझता था। मैंने हैंडीकैम नाइट मोड में किया तब सिर्फ कैमरे की छोटी सी स्क्रीन में ही जो देख पा रहा था, वो देखते हुए आगे बढ़ने लगा। शुरुआत में रास्ता नीचे की ओर जा रहा था। फिर पहाड़ के भीतर करीब 20 मीटर नीचे जाकर कैमरे की स्क्रीन में देखा तो आँखें चमक उठीं।

सामने लंबा गलियारा नुमा रास्ता नजर आया। इतना चौड़ा-ऊंचा कि बड़े आराम से खड़े होकर आगे बढ़ा जा सकता था। दिक्कत सिर्फ़ यही थी कि आँखों के सहारे नहीं सिर्फ एलसीडी स्क्रीन में देखने पर ही कुछ भी देख पा रहा था।

उधर उन महाशय की आवाज़ भी अब सुनाई देनी बन्द हो गई थी जो बेचारे मेरी जान की चिंता में रह-रहकर बाहर से मुझे पुकारते थे। मैं अंदाज़ लगाने की कोशिश कर रहा था कि मैं कितना नीचे आ चुका हूं और किस दिशा में बढ़ना है मुझे..? अगल-बगल की चट्टानों पर भी कैमरा घुमाता जा रहा था कि कहीं कोई नागदेव कृपा न कर बैठें मुझ पर...।

बहरहाल, अब तो जान हवाले कर ही दी थी। सो आगे ही बढ़ते जाना था। मैं अब खड़ा हो गया और ज्यों ही कदम बढ़ाए सुरंग के भीतर बने उस रास्ते पर जिसके आख़िर में मंजिल थी मेरी, सामने कुछ आहट सी महसूस हुई, लगा जैसे उसी रास्ते पर एक हलचल सी हुई...। मैं चौंका, सतर्क हुआ।

चाकू तुरन्त जेब से हाथ में आ गया और मैं तैयार हो गया किसी तेंदुए से मुठभेड़ के लिए...। असल में, जाड़े के दिनों में बाघ-तेंदुए ऐसी ही किसी सुरंग या गुफा-कंदरा के भीतर आराम फरमाते हैं दिन भर और रात में निकलते हैं शिकार पर। भालुओं की भी लगभग ऐसी ही लेकिन अपनी व्यवस्था होती है।

अंदर दिखा सफेद गोला, तभी विशालकाय अजगर से हुई मुठभेड़

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गुफा के बाहर बना गेट और भित्तिचित्र - फोटो : अमर उजाला

मैंने जब आहट सुनी तो लगा जरूर कोई तेंदुआ होगा। पर स्क्रीन में देखा तो दो चमकती आँखों के बजाय महज एक चमकीला सफ़ेद बड़े मोती सा गोला दिखा। किसी काली चीज पर रखा हुआ। वो भी मुझसे कम से कम 20 से 30 मीटर दूर। मैं सोचने लगा कि आख़िर ये सफेद गोला है क्या और वो आहट किसकी थी...। तभी फिर हलचल और एक आवाज़...। ओह ... ये एक विशालकाय अज़गर था...।

कैमरे में महज कुछ सेकेंड की उसकी हलचल से आभास हुआ कि अब वो अजग़र धैर्य खो चुका था और मेरी तरफ़ बढ़ने की कोशिश में था। ऐसे में दिल पर पत्थर रखकर मैंने तत्क्षण ही आगे बढ़ने का विचार त्याग दिया और जैसे सरकते हुए अंदर घुसा था वैसे ही सरकते हुए बाहर निकल आया...।

भारी मन से बिना उस सभागार तक पहुंचे मुझे लौटना पड़ा। लेकिन इस दुःसाहस ने मुझे ये तो बता दिया कि अंदर वाकई कुछ है...और वो अजग़र... उस अंधेरी सुरंग का अनजान रक्षक...।

और हाँ...वो चमकता सफ़ेद मोती सा गोला आप भी देखें और बूझने की कोशिश करें कि आख़िर ये क्या था...?? क्या सचमुच कोई योगी पहाड़ के भीतर हजारों साल से तपस्या में लीन हैं..??? क्या कोई अद्भुत खज़ाना आज भी तिलिस्म में कैद है..????

मिर्जापुर जिले की विंध्य पर्वतमाला पर स्थित इस रहस्यमयी सुरंग का पता छिपाने की कोशिश इसलिए की है ताकि कोई दुस्साहस में अपनी जान न गँवा बैठे। हालांकि इस सुरंग का रहस्य अब भी बरक़रार है।

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