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Muharram 2023: दुनिया में इकलौता है काशी में निकलने वाला दूल्हे का जुलूस, धधकती आग पर नंगे पैर चलते हैं लोग

Fri, 28 Jul 2023 04:22 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Fri, 28 Jul 2023 04:22 PM IST
सार

Muharram 2023: बनारस में मुहर्रम की नौवीं तारीख यानी आज रात सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाएगी। शहीदाने कर्बला की याद में 'दूल्हे का जुलूस' निकलेगा। इस ऐतिहासिक जुलूस में दुल्हा धधकते अंगारों से होकर गुजरता है। माना जाता है कि ऐसी परंपरा पूरी दुनिया में और कहीं नहीं निभाई जाती है।

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Muharram 2023 Dulhe ka juloos is the only one in the world in Kashi Varanasi know about it
मोहर्रम का जुलूस (सांकेतिक)

विस्तार

करीब छह सदी से अधिक पुराना है काशी में मुहर्रम पर निकलने वाला दूल्हे का जूलूस। अंगारों पर चलता हुआ, ताजियों को सलामी देता हुआ। साथ ही मजहबी दीवारों को तोड़ता हुआ। मान्यता ऐसी कि मुसलमानों के साथ हिंदू भी इस जुलूस को प्रति आस्था रखते हैं, इसे देखने के लिए जुटते हैं। आज शुक्रवार की देर रात नौवीं मुहर्रम को दूल्हे का ये कदीमी जुलूस शिवाला से उठेगा। क्या शिया, क्या सुन्नी, इस दूल्हे के जुलूस की जियारत को हिंदू भी पूरी आस्था के साथ उमड़ेंगे, मन्नतें मांगेंगे।  

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कहते हैं गंगा किनारे जंगल में घोड़े की नाल मिली थी जिस पर हजरत इमाम हुसैन के भतीजे हजरत कासिम के खास निशान बने थे। नाल शिवाला में लाकर रख दी गई और तब से ही शिवाला से हर साल मुहर्रम पर दूल्हे का जुलूस निकलता है। लोग मानते हैं कि जैसे जुलूस में दूल्हे के सिर पर ये नाल रखी जाती है, उस पर सवारी आ जाती है, तब वह आम इंसान से बेहद पाक हो जाता है। इस जुलूस में एक लाख से अधिक लोग शरीक होते हैं। इसकी खासियत यही है कि पूरी दुनिया में इकलौता दूल्हे का जुलूस काशी में ही उठता है।  

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ऐसे शुरू हुआ दूल्हे का जुलूस

मान्यता है कि करीब 650 साल पहले एक ब्राह्मण जंगल से होकर गुजर रहे थे। उन्होंने जंगल में 'या हुसैन या हुसैन' की आवाज सुनी। ढूंढने पर उन्हें वहां घोड़े की एक नाल मिली जिसमें से वो आवाज आ रही थी। वो ये देखकर खासा हैरान हुए। बड़ी हिम्मत कर वो वहां से नाल ले आए और शिवाला के मुसलमानों को दे दिया। शिवाला के आलिम हुसैन रिजवी बताते हैं कि नाल पर जो निशान मिले थे वो इमाम हसन के बेटे हजरत कासिम के माने जाते हैं।

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बताया जाता है कि उस वक्त उस नाल से तीन नाल तैयार की गई थी। उसे शिवाला के ही एक इमामबाड़े में रखा गया था। उस वक्त के लोग कहते थे कि आशूरा यानी मुहर्रम के दिन जो असली नाल थी वो बेहद सुर्ख हो जाया करती थी और उसमें से 'या हुसैन या हुसैन' की आवाज आती थी। कुछ ही दिन में इस नाल की मान्यता पूरे देश में फैल गई। चूंकि इसे हजरत कासिम के ही घोड़े की नाल माना गया इसलिए उसके बाद शिवाला से कासिम की याद में दूल्हे का जुलूस निकाला जाने लगा। शिवाला स्थित दूल्हे के इमामबाड़े में आज भी वो तीनों नाल रखे हुए हैं।

शादी से पहले शहीद हुए हजरत कासिम

हजरत अली समिति के सचिव सैयद फरमान हैदर बताते हैं कि आज से करीब 1300 साल पहले जब जुल्म के खिलाफ और इंसानियत को बचाने के लिए करबला की जंग इमाम हुसैन ने जंग लड़ी उसमें हजरत कासिम भी शामिल हुए थे। उस वक्त उनकी उम्र यही करीब 17 साल ही होगी और उनकी शादी इमाम हुसैन की बेटी से होने वाली थी। लेकिन जब करबला की जंग छिड़ी तो उसमें वो शहीद हो गए। उन्हीं की याद में नौवीं मुहर्रम को दूल्हे का जुलूस निकाला जाता है। हर साल शिवाला इलाके के ही एक नौजवान को दूल्हा बनाया जाता है। नाल कमेटी जिन्हें दूल्हा बनाती है, नौवीं मुहर्रम को गंगा में उसे नहलाया जाता है। उसे पाक साफ कर दूल्हे के इमामबाड़े पर ले जाया जाता है। 

शिया और सुन्नी की एकता की भी मिसाल

दूल्हे के इस जुलूस में शिया और सुन्नी की एकता की भी मिसाल देखने को मिलती है। यूं तो दूल्हे का इमामबाड़ा सुन्नी जमात का है लेकिन नौवीं मुहर्रम को शिया समुदाय के लोग ही इमामबाड़े पर जाकर नौहे पढते हैं। उसके बाद फातिहा पढ़ी जाती है। फातिहा पढ़ने के दौरान ही जिसे दूल्हा बनाया जाता है वो वहां रखी तीन नाल में से दो नाल को पकड लेता है और फिर ना तो वो नाल छोड़ता है और ना ही उसे कोई होश रहता है। इमामबाड़े के इर्द गिर्द चक्कर लगाने के बाद ये जुलूस अपने निर्धारित रास्तों से होकर गुजरता है। ये जुलूस 72 जगहों से गुजरता है जहां अंगारे बिछे होते है।

अंगारों से निकलते शोले के बीच से दूल्हे का जुलूस निकलता है और हजरत कासिम की शहादत को याद किया जाता है। इतनी जगह से अंगारों से गुजरने के बाद भी किसी को कुछ नहीं होता, यह करिश्मा ही कहा जाएगा। ये जुलूस शहर के तकरीबन हर वक्फ इमामबाड़े से होकर गुजरता है और ताजियों को सलामी देता है। एक तरह से देखा जाए तो ये पूरा कहानी या मान्यताअध्यात्म और मुसलमानों की अकीदत से जुड़ा है। 

मुहर्रम के दौरान बनारस में कई ऐतिहासिक जुलूस

सिर्फ दूल्हे का ही जुलूस नहीं बनारस में मुहर्रम के दौरान ऐसे कई जुलूस निकलते हैं जो ना सिर्फ ऐतिहासिक हैं बल्कि पूरी दुनिया में इकलौते भी। दूल्हे की जुलूस की तरह ही छह मुहर्रम को बनारस के कच्चीसराय से निकलने वाला 40 घंटे का जुलूस भी अपने आप में खास है। ये इकलौता जुलूस है जो कि लगातार 40 घंटे से भी अधिक समय तक चलता है। अलम, दुलदुल के साथ ही इस जुलूस में बाजे गाजे के साथ ही हाथी, ऊंट भी शामिल होता है। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड  रिकार्ड में शामिल कराने की भी कोशिश की जा रही है।

इसी तरह खुशी के साज शहनाई पर भी यहां मातम की धुनें मुहर्रम के दौरान ही सुनने को मिलती हैं जिसकी रवायत खुद भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शुरू की थी। पांचवीं मुहर्रम को दालमंडी से उठने वाले मुहर्रम के जुलूस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई पर मातमी धुन बजाकर इमाम हुसैन और करबला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश किया करते थे। आज भी उनकी ये रवायत कायम है। अब उनके घरवाले इस परंपरा को निभा रहे हैं।

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