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माता को लगाया चंदन का लेप, कोरोना से मुक्ति की कामना
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वैशाख पूर्णिमा पर माता शीतला को चंदन का लेप लगाकर कोरोना महामारी से मुक्ति की कामना की गई। इसके साथ ही मंदिर में 36 साल से चली आ रही परंपरा का निर्वहन सादगी से किया गया। बुधवार को वैशाख पूर्णिमा पर दशाश्वमेध घाट स्थित सिद्धपीठ बड़ी शीतला माता माई धाम में वार्षिक चंदन शृंगार की परंपरा निभाई गई।
कोरोना महामारी से निजात के लिए विशेष पूजन किया गया। पूर्णिमा पर माता के जलाभिषेक के लिए शीतला मंदिर में हर साल श्रद्धालुओं की भीड़ लगती थी, लेकिन पिछले साल से वैशाख पूर्णिमा पर कोरोना संक्रमण के कारण सांकेतिक रूप में ही परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। बुधवार को भी महंत परिवार ने 11 लोगों के साथ जलाभिषेक कर चंदन शृंगार किया। माता के मंदिर को नीम की पत्तियों से सजाया गया था।
महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ने बताया कि वर्षों पहले एक भयानक महामारी आई हुई थी तब काशी की जनता ने मिलकर वैशाख पूर्णिमा पर मां शीतला को गंगाजल और धार चढ़ाकर क्षमा मांगते हुए याचना की तब से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। कन्हैया दूबे केडी सहित पुजारियों ने ग्यारह कलश गंगाजल चढ़ाया। केसरयुक्त चंदन से शृंगार कर हलुआ, घुघरी, बताशा, चना, गुलगुला चढ़ाकर विभिन्न प्रकार के फूलों से मां को सुसज्जित करते हुए आरती उतारी।
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हर वर्ष हजारों की संख्या में भक्त शोभायात्रा झंडा बधावा के साथ मां के गर्भगृह में जाकर सिर्फ एक दिन अपने हाथों से गंगाजल चढ़ाया करते थे, लेकिन इस वर्ष कोरोना कर्फ्यू के कारण भक्तों के लिए यह परंपरा प्रतिबंधित थी। नवविवाहित जोड़ों ने भी मां शीतला की चौखट पर परंपराओं का निर्वहन करते हुए पूजन किया।
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कोरोना महामारी से निजात के लिए विशेष पूजन किया गया। पूर्णिमा पर माता के जलाभिषेक के लिए शीतला मंदिर में हर साल श्रद्धालुओं की भीड़ लगती थी, लेकिन पिछले साल से वैशाख पूर्णिमा पर कोरोना संक्रमण के कारण सांकेतिक रूप में ही परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। बुधवार को भी महंत परिवार ने 11 लोगों के साथ जलाभिषेक कर चंदन शृंगार किया। माता के मंदिर को नीम की पत्तियों से सजाया गया था।
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महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ने बताया कि वर्षों पहले एक भयानक महामारी आई हुई थी तब काशी की जनता ने मिलकर वैशाख पूर्णिमा पर मां शीतला को गंगाजल और धार चढ़ाकर क्षमा मांगते हुए याचना की तब से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। कन्हैया दूबे केडी सहित पुजारियों ने ग्यारह कलश गंगाजल चढ़ाया। केसरयुक्त चंदन से शृंगार कर हलुआ, घुघरी, बताशा, चना, गुलगुला चढ़ाकर विभिन्न प्रकार के फूलों से मां को सुसज्जित करते हुए आरती उतारी।
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हर वर्ष हजारों की संख्या में भक्त शोभायात्रा झंडा बधावा के साथ मां के गर्भगृह में जाकर सिर्फ एक दिन अपने हाथों से गंगाजल चढ़ाया करते थे, लेकिन इस वर्ष कोरोना कर्फ्यू के कारण भक्तों के लिए यह परंपरा प्रतिबंधित थी। नवविवाहित जोड़ों ने भी मां शीतला की चौखट पर परंपराओं का निर्वहन करते हुए पूजन किया।