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बीएचयू और काशी के विद्वानों का दावा: आदितीर्थ है मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट पर नहीं बिके थे राजा हरिश्चंद्र
Sun, 25 Feb 2024 05:32 PM IST
प्रगति चंद
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी।
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Sun, 25 Feb 2024 05:32 PM IST
सार
बीएचयू के धर्म विद्या विज्ञान संकाय, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा और काशी के विद्वानों का दावा है कि मणिकर्णिका महाश्मशान नहीं आदितीर्थ है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर जो भी मिथक हैं, उसे सिरे से खारिज कर दिया है।
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मणिकर्णिका घाट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मणिकर्णिका महाश्मशान नहीं आदितीर्थ है। हरिश्चंद्र घाट का राजा हरिश्चंद्र से कोई सीधा संबंध नहीं है। काशी के अविमुक्त क्षेत्र के अंदर जो महाश्मशान है उसका असली स्थान जलासेन घाट है। लंबे समय से मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर जो भी मिथक हैं, उसे बीएचयू और काशी के विद्वानों की आनंदकानन वन काशी ढूंढे टीम ने सिरे से खारिज कर दिया है।
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बीएचयू के धर्म विद्या विज्ञान संकाय, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा और काशी के विद्वानों ने काशी खंड और 18 पुराणों के अध्ययन के बाद मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के इस सच को सामने रखा है। 15 दिनों के अध्ययन और खोज के बाद विशेषज्ञों और विद्वानों ने बताया कि मणिकर्णिका श्मशान नहीं काशी का आदितीर्थ है। इसे महाश्मशान या श्मशान कहना उचित नहीं है। काशी के अविमुक्त क्षेत्र के अंदर जो महाश्मशान है उसका स्थान जलासेन घाट है। वहीं पर जलासेनी शिवलिंग भी गंगा के अंदर विराजमान है जो शिव के साधकों को ही नजर आता है।
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जलासेन घाट पर ही खुद को बेचा था राजा हरिश्चंद्र ने
काशी के जिस अविमुक्त महाक्षेत्र के महाश्मशान में राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य के धर्म को पूर्ण करने के लिए अपने आपको बेचा था। वह पवित्र स्थान मणिकर्णिका तट पर ही है। काशी खंड के श्लोक के अनुसार वह स्थान मां विशालाक्षी देवी के सामने जलासेन घाट ही था। मणिकर्णिका कुंड के उत्तर में राजा हरिश्चंद्र द्वारा स्थापित हरिश्चंद्रेश्वर शिवलिंग एवं हरिश्चंद्र विनायक और वहीं सीमा विनायक विद्यमान हैं। मान्यता है कि मणिकर्णिका तीर्थ पर गंगा में जो मनुष्य हरिश्चंद्र महातीर्थ में स्नान कर, हरिश्चंद्रेश्वर को प्रणाम करे, वह कभी सत्य से भ्रष्ट नहीं होता।
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पृथ्वी के नाभिस्थान में है मणिकर्णिका तीर्थ
काशीखंड में अग्निबिंदु ने श्रीहरि से पूछा है कि हे माधव पुण्यभूमि मणिकर्णिका कहां तक है तो भगवान विष्णु ने बताया कि दक्षिण गंगाकेशव से उत्तर हरिश्चंद्र मंडप, पूर्व आधी गंगा से पश्चिम स्वर्गदार तक मणिकर्णिका की सीमा है। पुराणों के अनुसार मणिकर्णिका पृथ्वी के नाभिस्थान में है और इसे नाभितीर्थ कहा जाता है।
राजा हरिश्चंद्र से नहीं है हरिश्चंद्र घाट का कोई संबंध
केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने बताया कि काशीखंड में वर्णित श्लोकों से यह स्पष्ट है कि सोनारपुरा में गंगा के तट पर स्थित हरिश्चंद्र श्मशान घाट से राजा हरिश्चंद्र का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। हरिश्चंद्रघाट का भ्रामक प्रचार प्रसार कर लोग काशी के केदारखंड एवं हरिद्वार क्षेत्र के महत्व को नष्ट कर रहे हैं।
ये रहे टीम में शामिल
बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, काशी करवत मंदिर के महेश उपाध्याय, मंगला गौरी के महंत नरेंद्र पांडेय, धर्मशास्त्री अवधराम पांडेय, वेदमूर्ति शास्त्री, मनीष पांडेय, डाॅ. संजय मिश्र, प्रो. उपेंद्र देव पांडेय, सुधांशु पांडेय, मार्कंडेय तिवारी, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा की टीम ने अध्ययन किया है।
राजा हरिश्चंद्र से नहीं है हरिश्चंद्र घाट का कोई संबंध
केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने बताया कि काशीखंड में वर्णित श्लोकों से यह स्पष्ट है कि सोनारपुरा में गंगा के तट पर स्थित हरिश्चंद्र श्मशान घाट से राजा हरिश्चंद्र का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। हरिश्चंद्रघाट का भ्रामक प्रचार प्रसार कर लोग काशी के केदारखंड एवं हरिद्वार क्षेत्र के महत्व को नष्ट कर रहे हैं।
ये रहे टीम में शामिल
बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, काशी करवत मंदिर के महेश उपाध्याय, मंगला गौरी के महंत नरेंद्र पांडेय, धर्मशास्त्री अवधराम पांडेय, वेदमूर्ति शास्त्री, मनीष पांडेय, डाॅ. संजय मिश्र, प्रो. उपेंद्र देव पांडेय, सुधांशु पांडेय, मार्कंडेय तिवारी, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा की टीम ने अध्ययन किया है।
गंगा से पहले हड़हा सराय में होता था अस्थि विसर्जन
काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है कि काशीखंड व पुराणों के अध्ययन से पता चलता है कि काशी में गंगा के आने से पहले मृतकों के अस्थि विसर्जन के लिए तडाग स्थान गोकणेश्वर से हाटकेश्वर होते हुए हड़हा सराय में हुआ करता था। यहां पर किंकसेश्वर का दर्शन करने के बाद अस्थियों को डाला जाता था।
दोपहर में स्नान का है महत्व
मान्यता के अनुसार माता पार्वती जी का कर्ण फूल यहीं गिरा था जिससे इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया। यहीं से पंचक्रोशी यात्रा का संकल्प लेकर श्रद्धालु पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। मणिकर्णिका घाट पर दोपहर में स्नान का महत्व है।
दोपहर में स्नान का है महत्व
मान्यता के अनुसार माता पार्वती जी का कर्ण फूल यहीं गिरा था जिससे इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया। यहीं से पंचक्रोशी यात्रा का संकल्प लेकर श्रद्धालु पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। मणिकर्णिका घाट पर दोपहर में स्नान का महत्व है।