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मकर संक्रांति पर विशेष: शिव की नगरी काशी में तिमिर ने ढांप दिया साम्ब का सूर्य

Sun, 13 Jan 2019 01:58 PM IST
kapil kumar न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Published by: kapil kumar Updated Sun, 13 Jan 2019 01:58 PM IST
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Makar sankranti 2019 special story from kashi temple
कुंड के निकट स्थित मंदिर में साम्बादित्य के दर्शन - फोटो : अमर उजाला
काशी के बीचोंबीच औरंगाबाद के पास सूर्य कुंड मोहल्ले में हूं। सुना है यहां साम्ब के ‘सूर्य’ रहते हैं। एक तरु के तले स्वर्णिम अतीत के खंडहर रहते हैं। सच कहूं तो पढ़ा था कि यह स्थान साम्बादित्य का है, लेकिन ‘सुना’ है लिखने को विवश हूं। जगत को आलोकित करने वाले आदित्य काशी में सुविमल तेज पाने के लिए द्वादश रूप में वास करते हैं।
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तेज के आकांक्षी सूर्य देव की पौराणिक संपदा को तिमिर ने ढांप दिया है। सूरज कुंड सिसकते हुए यही कहता है, पर उसकी आवाज शायद किसी के कानों तक नहीं पहुंच पाती। एक ओर यह उदासीनता है तो दूसरी ओर आस्था की अतलता। वह आस्था जो मलिनता को अपने पैरों तले रौंद देती है। श्रद्धा जब पूर्ण समर्पित भाव से कुंड में उतरती है तो अपने आराध्य आदित्य को अर्घ देकर ही बाहर निकलती है। भक्ति के इस चरमोत्कर्ष के लिए चरम रोग मुक्तिदायक सूर्य कुंड को उसकी पवित्रता लौटानी ही चाहिए।
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मकर संक्रांति सूर्य देव का पर्व है। काशी में आदित्य द्वादश रूप में निवास करते हैं। उन्हीं में से एक रूप साम्बादित्य का है। स्कंद पुराण के काशी खंड में इस कुंड को साम्ब कुंड कहा गया है जो अब सूरज कुंड के नाम से विख्यात है। पूरे मोहल्ले की पहचान इसी से है। श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब गुमनाम हो चुके हैं। जनमानस सूर्य मंदिर ही जानता है और यही नाम दीवार पर अंकित भी है।
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अंतिम छोर पर यह प्राचीन स्थल है जो अपना वैभव पूरी तरह खो चुका है। हां, उसके निशां जरूर बिखरे हुए हैं। कुंड पक्का है। चारों ओर बाउंड्री भी है। कुछ नहीं है तो स्वच्छता। न जल में और न बाहर। यह स्थान अनदेखी और अतिक्रमण का शिकार है। पानी का स्रोत बारिश है।

कुंड की सीढ़ियां, दीवारों पर उपेक्षा की छाप गहराई है। स्थानीय लोग कुंड में गंदगी के लिए बंदरों को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन शायद खुद को भूल जाते हैं। कुंड के निकट स्थित मंदिर में साम्बादित्य के दर्शन हैं। मध्य में सूर्य हैं और उनके चारों ओर सात अश्वों की मुखाकृति है। स्थानीय लोग इसे सूर्य मंदिर ही कहते हैं। 

Makar sankranti 2019 special story from kashi temple
राजन कुमार ने बताया, पहले कुंड की और भी दयनीय दशा थी। इसमें गाय-भैंस बैठी रहती थीं। आसपास का सीवर भी गिरता था। तब भी दूर देश के श्रद्धालु इसमें स्नान करते थे। 2007 में इसका जीर्णोद्धार हुआ। चारों ओर बाउंड्रीवाल हुई। इसमें पानी के लिए सबमर्सिबल भी लगाई गई, लेकिन कुछ  समय बाद वह खराब हो गई। कुंड में सबसे ज्यादा गंदगी बंदर करते हैं।

वे बाहर बिखरे कूड़े को इस कुंड में डाल देते हैं। अब भी कभी-कभी बाहर से श्रद्धालु यहां आते हैं और कुंड में स्नान करते हैं। इसके बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता। सुना है, कोई श्रीकृष्ण के वंशज थे, जिन्होंने इस कुंड में स्नान कर चर्म रोग से मुक्ति पाई थी।

धूल फांक रहे पुरावशेष

Makar sankranti 2019 special story from kashi temple
कुंड के पास पेड़ के नीचे पुरावशेष धूल फांक रहे हैं। प्राचीन काल में इस स्थान पर रहे वैभवशाली सूर्य मंदिर के ये बाकी निशां हैं, जिनको संग्रहालय में संरक्षित करने की जरूरत ही महसूस नहीं की गई। यह अनदेखी वाकई चौंकाती है। यहां सूर्य के कमलाकार दो पाषाण बिंब हैं। साथ ही प्राचीन मंदिर के शिलाखंड भी हैं। डायना एल. एक् ने अपनी पुस्तक बनारस सिटी ऑफ लाइट में इन अवशेषों का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि काशी के इस सूर्य कुंड पर बहुत विशाल मंदिर होने के चिह्न आज भी मौजूद हैं। जो बताते हैं कि प्राचीन काल में इस स्थान पर वैभवशाली सूर्य मंदिर रहा होगा। ये संरचनाएं पांचवीं-छठवीं शताब्दी की प्रतीत होती हैं।
 

कथा साम्बादित्य की

काशी खंड में साम्बादित्य की कथा का वर्णन है। नारद मुनि के शाप से कुष्ठ रोगी हुए श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब रोग निवारण के लिए काशी आए। यहां उन्होंने एक कुंड का निर्माण किया और सूर्योपासना करने लगे। सूर्य नारायण की कृपा से साम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हो पुन: रूपवान हो गए। उनके द्वारा उपासित साम्बादित्य नामक सूर्य विग्रह तब से सभी उपासकों को विपदा शून्य ऐश्वर्य देते रहते हैं। जो व्यक्ति रविवार को अरुणोदय काल में साम्ब कुंड में स्नान कर साम्बादित्य का पूजन करता है, वह कभी रोग ग्रस्त नहीं होता।
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