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बनारस महामूर्ख मेला: जहां मूर्ख बनने के लिए 55 सालों से घाट पर आते हैं बनारसी, पुरुष बनता है दुल्हन व महिला...

Fri, 31 Mar 2023 11:37 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Fri, 31 Mar 2023 11:37 AM IST
सार

महामूर्ख मेला में अब तक न जाने कितने ही विशिष्ट जन बेमेल विवाह के बंधन में बंध चुके हैं। इसमें पुरुष दुल्हन और महिला दूल्हा बनती है। कार्यक्रम की शुरुआत गर्दभ (गधा) ध्वनि से होता है। चीपो चीपो की आवाज से जब घाट गूंजने लगता है तो पूरा माहौल ठहाकों से गूंज उठता है।

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Mahamurkh Mela of Banaras Where Banarasi come to the ghat for 55 years to be fooled, man becomes bride and wo
महामूर्ख सम्मेलन की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मंदिरों के शहर बनारस की परंपराएं भी अलग-अलग हैं। धर्म और संस्कृति के अलावा संत कबीर का यह शहर अपनी ही अल्हड़ मस्ती, फक्कड़पन व मौज के लिए जाना जाता है। इसी परंपरा को गंगा के तट पर पिछले 55 सालों से महामूर्ख मेले के रूप में जीवंत रखा गया है। मूर्ख बनने के लिए बनारसी पिछले 55 सालों से काशी के घोड़ा घाट पर इस परंपरा के साक्षी बन रहे हैं।

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जी हां घोड़ा घाट जिसका नाम शायद अब लोग बिसरा चुके हैं। घोड़ा घाट अब डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद घाट के नाम से जाना जाता है। इस घाट पर पिछले कई छह दशकों से शनिवार गोष्ठी की ओर से पहली अप्रैल को महामूर्ख मेला आयोजित हो रहा है। काशी के साहित्यकारों, साहित्यसेवियों तथा हास्य रसिकों के मंच ने बनारस की मौज, मस्ती, फक्कड़पन, अल्हड़ मिजाजी को जिंदा रखने की परंपरा का जो बीड़ा उठा रखा है उसके सहयोगी काशीवासी भी हैं। ना कोई प्रचार ना तो कोई बैनर, हर काशीवासी को एक अप्रैल की शाम का इंतजार रहता है। शाम के सात बजते-बजते राजेंद्र प्रसाद घाट का मुक्ताकाशीय मंच दर्शकों से खचाखच भर जाता है। महामूर्ख मेला में लाखों लोग खुद-बखुद मूर्ख बनने के लिए घाट की सीढ़ियों पर आकर बैठ जाते हैं। दर्शक घोड़ा घाट की सीढ़ियां पर बैठ कर घंटों ठहाका लगाते हुए इसका आनंद लेते हैं।

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Mahamurkh Mela of Banaras Where Banarasi come to the ghat for 55 years to be fooled, man becomes bride and wo
महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन - फोटो : अमर उजाला

डेढ़सी पुल से हुई थी शुरूआत
महामूर्ख मेला के संयोजक सुदामा तिवारी सांड़ बनारसी बताते हैं कि 55 साल पहले महामूर्ख मेले की शुरुआत डेढ़सी पुल से हुई थी। उस दौरान चकाचक बनारसी, बेढब बनारसी, मोहनलाल गुप्त भइयाजी बनारसी, माधव प्रसाद मिश्र (एम भारती), केदारनाथ गुप्त, धर्मशील चतुर्वेदी व सांड़ बनारसी ने डेढ़सी पुल से की थी। इसके बाद पं. करुणापति त्रिपाठी ने इसको बजड़े पर करने को कहा। इसके बाद चौक थाने के सामने भद्दोमल की कोठी पर आयोजन होने लगा और कोठी जब ध्वस्त हो गई तो चौक थाने में भी महामूर्ख मेला सजने लगा। बाद में यह आयोजन घोड़ा घाट (डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद घाट) पर शुरू हुआ।
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बेमेल विवाह का साक्षी है महामूर्ख मेला
महामूर्ख मेला में अब तक न जाने कितने ही विशिष्ट जन बेमेल विवाह के बंधन में बंध चुके हैं। इसमें पुरुष दुल्हन और महिला दूल्हा बनती है। कार्यक्रम की शुरुआत गर्दभ (गधा) ध्वनि से होता है। चीपो चीपो की आवाज से जब घाट गूंजने लगता है तो पूरा माहौल ठहाकों से गूंज उठता है। इसमें दूल्हा-दुल्हन बनने वालों में पीलू मोदी, महेन्द्र शाह, सुनील शास्त्री, पं. लोकपति त्रिपाठी, चन्द्रा त्रिपाठी, श्याम लाल यादव, शैल चतुर्वेदी, गोविंद अग्रवाल, डाॅ. अनुराग टंडन, डाॅ. शालिनी टंडन आदि कई विशिष्ट जनों के नाम जुड़े हैं।
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जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है विवाह
मेले के संचालक व हास्य कवि दमदार बनारसी ने बताया कि महामूर्ख मेला काव्य साहित्यिक जगत का अविरल मेला है। गंगा के तट पर सजने वाला महामूर्ख मेला इस सोच से आरंभ किया गया था कि आज हर कोई मूर्ख है। जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता विवाह है और इसी के आधार पर बेमेल विवाह का आयोजन होता है। कवियों को उटपटांग उपहार देकर सम्मानित किया जाता है।

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