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महामना के अंध विद्यालय को ‘रोशनी’ की दरकार
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महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित श्री नेत्रहीन अंध विद्यालय एवं छात्रावास बदहाली और दुर्दशा का शिकार है। इसे अब संजीवनी की दरकार है। पहले यहां दिव्यांगों को कुर्सी की बुनाई का प्रशिक्षण दिया जाता था। साथ ही ब्रेल लिपि में पढ़ाई होती थी, लेकिन बदहाली के चलते अब यहां न शिक्षक हैं ना छात्र। विद्यालय की देखरेख करने वाले ज्योति सिंह बताते हैं कभी विद्यालय का अपना रुआब हुआ करता था, दर्जनों छात्र प्रशिक्षण के लिए आते थे। अब सब खत्म हो चुका है। ज्योति सरकार और दान दाताओं को दोष देने के बजाय विद्यालय के पूर्व आचार्यों की आपसी लड़ाई को इस दुर्दशा का कारण मानते हैं। बताया कि यहां से शिक्षा ग्रहण कर दर्जनों छात्र अच्छे पदों पर तैनात हैं। हाल ही में शोध छात्र राजकुमार सिंह का चयन बिहार में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हुआ है। छात्रों के लिए अब एक हॉल ही बचा है। भदैनी निवासी डॉ. अनिल शुक्ल बताते हैं कि इस विद्यालय का कभी गौरव हुआ करता था। मोहल्ले के लोग भी मदद करते थे, लेकिन आपसी टकराव के चलते विद्यालय का यह हाल हुआ है। तुलसी दास मिश्र बताते हैं कि इस अंध विद्यालय में छात्रों का संवर्धन होता था। उन्हें विभिन्न प्रकार की कुर्सियों को बीनने, उन्हें सुधारने का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस मामले में अब जिला प्रशासन से ही उम्मीद है। वह इस पर ध्यान देकर इसे अंधकार से निकाल सकता है।
1940 में हुई थी स्थापना
नेत्रहीन विद्यालय की स्थापना सन 1940 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने की थी। दान दाताओं में महामना का नाम प्रमुख है। महामना इस शिक्षा मंदिर को पांच रुपये दान देते थे। यहां काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, संस्कृत विश्वविद्यालय तथा अन्य विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र रहते थे।
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1940 में हुई थी स्थापना
नेत्रहीन विद्यालय की स्थापना सन 1940 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने की थी। दान दाताओं में महामना का नाम प्रमुख है। महामना इस शिक्षा मंदिर को पांच रुपये दान देते थे। यहां काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, संस्कृत विश्वविद्यालय तथा अन्य विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र रहते थे।
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