{"_id":"6756053c1bd2038a1e0c0c05","slug":"mahakumbh-of-religion-spirituality-and-heritage-completed-with-apparatus-varanasi-news-c-20-vns1056-816520-2024-12-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"Varanasi News: जयघोष के साथ पूरा हुआ धर्म, अध्यात्म और विरासत का महाकुंभ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Varanasi News: जयघोष के साथ पूरा हुआ धर्म, अध्यात्म और विरासत का महाकुंभ
विज्ञापन
- सद्गुरु आचार्य व संत प्रवर से आशीर्वाद लेने के लिए उमड़े भक्त
- बोले संत विज्ञानदेव, कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं, अज्ञानता हमारे दुखों का कारण
माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी/चौबेपुर। विहंगम योग के शताब्दी समारोह का तीन दिवसीय आयोजन पूरा होने के साथ ही विहंगम योगी रवाना होने लगे। गुरु चरणों की रज माथे से लगाकर अगले साल आने का संकल्प लेकर विहंगम योगियों ने गुरु से विदा ली। इसके साथ ही धर्म, अध्यात्म और विरासत का महाकुंभ भी पूरा हो गया। 25 हजार कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ की रविवार को विधि-विधान से पूर्णाहुति हुई। तीन दिनों तक स्वर्वेद की अमृत ज्ञान गंगा प्रवाहित होती रही और सभी भक्त दर्शन करके अपने गंतव्य को रवाना होते रहे।
रविवार को महायज्ञ के समापन पर देश-विदेश से आने वाले भक्तों को संबोधित करते हुए सद्गुरु आचार्य स्वतंत्र देव महाराज ने कहा कि आत्मोद्धार सर्वश्रेष्ठ साधन भक्ति है लेकिन आज की भक्ति अज्ञान और आडंबरयुक्त जड़भक्ति है। जड़भक्ति से ऊपर उठकर भक्ति के चेतन पथ पर अग्रसर होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विहंगम योग ही विशुद्ध चेतन भक्ति है, जिसमें साधक संपूर्ण विकारों को त्यागकर आतंरिक शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है।
भक्तों को संदेश देते हुए संत प्रवर विज्ञान देव महाराज ने कहा कि हमारा अज्ञान ही हमारे दुखों का कारण है। कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं है। अच्छाइयां-बुराइयां सबके भीतर हैं। हमे दुर्बलताओं, कठिनाइयों से घबराना नहीं है। उन कठिनाइयों को दूर करने की जो प्रेरणा, जो शक्ति, जो सामर्थ्य है वह अध्यात्म के आलोक से और स्वर्वेद के स्वर से एक साधक को अवश्य ही प्राप्त होती हैं, क्योंकि हमारे भीतर अंतरात्मा रूप में परमात्मा ही तो स्थित है। कार्यक्रम का समापन वंदना, आरती और शांति पाठ के साथ किया गया। समापन के बाद सद्गुरु आचार्य स्वतंत्रदेव एवं संत प्रवर विज्ञान देव के दर्शन के लिए अनुयायियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
विज्ञापन
-- --
स्थापित होगी सदाफल देव महाराज की 135 फीट प्रतिमा
25 हजार कुंडीय महायज्ञ में देश-दुनिया से डेढ़ लाख से ज्यादा भक्त-शिष्यों ने अपनी व्यष्टिगत एवं समष्टिगत कामनाओं की पूर्ति के निमित्त यज्ञ-कुंड में आहुतियां अर्पित कीं। वार्षिकोत्सव में आए लाखों श्रद्धालुओं ने गुरु के समक्ष अपने दोनों हाथ उठाकर विधिवत सेवा, सत्संग, साधना करने का संकल्प लिया। इसके साथ ही विहंगम योग के प्रमुख ग्रंथ स्वर्वेद को जन-जन तक पंहुचाने और स्वर्वेद महामंदिर के ही समीप विहंगम योग के प्रणेता सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज की 135 फीट से भी अधिक ऊंची प्रतिमा के निर्माण का भी संकल्प लिया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के साथ गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, दिल्ली, राजस्थान हरियाणा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, असम आदि प्रदेशों के साथ ही भारत के अतिरिक्त 19 देशों से लगभग डेढ़ लाख अनुयायियों ने आशीर्वाद प्राप्त किया।
-- -
बहती रही सेवा, सत्संग और साधना की त्रिवेणी
आयोजन में सेवा, सत्संग और साधना की दिव्य त्रिवेणी बहती रही जिसमें सभी साधकों ने अपने आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की दिव्य प्रेरणा ली। तीन दिनों के इस महाआयोजन में डेढ़ लाख से अधिक की संख्या में पहुंचकर श्रद्धालुओं ने स्वर्वेद महामंदि के दर्शन किए। आयोजन में प्रतिदिन निशुल्क योग, आयुर्वेद, पंचगव्य, होम्योपैथ आदि चिकित्सा पद्धतियों द्वारा कुशल चिकित्सकों के निर्देशन में रोगियों को चिकित्सा परामर्श के साथ चिकित्सा की भी व्यवस्था की गई थी।
विज्ञापन
- बोले संत विज्ञानदेव, कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं, अज्ञानता हमारे दुखों का कारण
माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी/चौबेपुर। विहंगम योग के शताब्दी समारोह का तीन दिवसीय आयोजन पूरा होने के साथ ही विहंगम योगी रवाना होने लगे। गुरु चरणों की रज माथे से लगाकर अगले साल आने का संकल्प लेकर विहंगम योगियों ने गुरु से विदा ली। इसके साथ ही धर्म, अध्यात्म और विरासत का महाकुंभ भी पूरा हो गया। 25 हजार कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ की रविवार को विधि-विधान से पूर्णाहुति हुई। तीन दिनों तक स्वर्वेद की अमृत ज्ञान गंगा प्रवाहित होती रही और सभी भक्त दर्शन करके अपने गंतव्य को रवाना होते रहे।
रविवार को महायज्ञ के समापन पर देश-विदेश से आने वाले भक्तों को संबोधित करते हुए सद्गुरु आचार्य स्वतंत्र देव महाराज ने कहा कि आत्मोद्धार सर्वश्रेष्ठ साधन भक्ति है लेकिन आज की भक्ति अज्ञान और आडंबरयुक्त जड़भक्ति है। जड़भक्ति से ऊपर उठकर भक्ति के चेतन पथ पर अग्रसर होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विहंगम योग ही विशुद्ध चेतन भक्ति है, जिसमें साधक संपूर्ण विकारों को त्यागकर आतंरिक शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है।
विज्ञापन
भक्तों को संदेश देते हुए संत प्रवर विज्ञान देव महाराज ने कहा कि हमारा अज्ञान ही हमारे दुखों का कारण है। कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं है। अच्छाइयां-बुराइयां सबके भीतर हैं। हमे दुर्बलताओं, कठिनाइयों से घबराना नहीं है। उन कठिनाइयों को दूर करने की जो प्रेरणा, जो शक्ति, जो सामर्थ्य है वह अध्यात्म के आलोक से और स्वर्वेद के स्वर से एक साधक को अवश्य ही प्राप्त होती हैं, क्योंकि हमारे भीतर अंतरात्मा रूप में परमात्मा ही तो स्थित है। कार्यक्रम का समापन वंदना, आरती और शांति पाठ के साथ किया गया। समापन के बाद सद्गुरु आचार्य स्वतंत्रदेव एवं संत प्रवर विज्ञान देव के दर्शन के लिए अनुयायियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
विज्ञापन
स्थापित होगी सदाफल देव महाराज की 135 फीट प्रतिमा
25 हजार कुंडीय महायज्ञ में देश-दुनिया से डेढ़ लाख से ज्यादा भक्त-शिष्यों ने अपनी व्यष्टिगत एवं समष्टिगत कामनाओं की पूर्ति के निमित्त यज्ञ-कुंड में आहुतियां अर्पित कीं। वार्षिकोत्सव में आए लाखों श्रद्धालुओं ने गुरु के समक्ष अपने दोनों हाथ उठाकर विधिवत सेवा, सत्संग, साधना करने का संकल्प लिया। इसके साथ ही विहंगम योग के प्रमुख ग्रंथ स्वर्वेद को जन-जन तक पंहुचाने और स्वर्वेद महामंदिर के ही समीप विहंगम योग के प्रणेता सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज की 135 फीट से भी अधिक ऊंची प्रतिमा के निर्माण का भी संकल्प लिया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के साथ गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, दिल्ली, राजस्थान हरियाणा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, असम आदि प्रदेशों के साथ ही भारत के अतिरिक्त 19 देशों से लगभग डेढ़ लाख अनुयायियों ने आशीर्वाद प्राप्त किया।
बहती रही सेवा, सत्संग और साधना की त्रिवेणी
आयोजन में सेवा, सत्संग और साधना की दिव्य त्रिवेणी बहती रही जिसमें सभी साधकों ने अपने आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की दिव्य प्रेरणा ली। तीन दिनों के इस महाआयोजन में डेढ़ लाख से अधिक की संख्या में पहुंचकर श्रद्धालुओं ने स्वर्वेद महामंदि के दर्शन किए। आयोजन में प्रतिदिन निशुल्क योग, आयुर्वेद, पंचगव्य, होम्योपैथ आदि चिकित्सा पद्धतियों द्वारा कुशल चिकित्सकों के निर्देशन में रोगियों को चिकित्सा परामर्श के साथ चिकित्सा की भी व्यवस्था की गई थी।