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मऊ में मां कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर, औरगंजेब ने की थी तोड़ने की कोशिश मगर...
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी/मऊ
Updated Fri, 31 Mar 2017 10:45 AM IST
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मऊ में मां कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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चैत्र नवरात्र के इस शुभ अवसर पर देवीधाम में दर्शन-पूजन करने के लिए भक्तों का रेला लगा गया है। मऊ जिले के बडरांव ब्लॉक अंतगर्त मांदी सिपाह स्थित मां कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां नवरात्र भर दूर दराज सहित पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से श्रद्धालुओं का रेला लगा रहता है।
नवरात्रि पर इस मंदिर में ज्यादा ही गहमागहमी हो जाती है। इस मंदिर के साथ कई पौराणिक कहानियां जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि मुगल शासनकाल में जंगल में वहां मूर्तियां थी। औरगंजेब ने मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करवाया था। एक अन्य किवदंती के अनुसार जब चोर चोरी करने या माल को आपस में बांटने के लिए उसी जंगल से होकर आना जाना या ठहराव होता था तो वे मूर्तियां चोर-चोर कहकर शोर मचाने का काम करती थीं।
तो चोरों ने गुस्से में आकर उन मूर्तियों को ही अपना निशाना बनाया। कटा हुआ हिस्सा उठाकर चोर ले जाने लगे तो कुछ ही दूर गए थे कि सभी अंधे हो गए। तभी उन्होंने मूर्ति को वहीं छोड़कर पूजन अर्चन करना शुरू कर दिया। ऐसा करने से उनकी आंखों में रौशनी वापस आ गई।
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बताया जाता है कि पहले वे मूर्तियां सोने की थी जो कटने के साथ ही सिर और धड़ सभी काले रंग के पत्थर में बदल गए। मूर्ति खंडों को जहां चोरों ने छोड़ा वहां वे मूर्ति खंड मां कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर के नाम से पूज्य हुई।
इस तरह रेयांव की ददोरिया माई और मांदी सिपाह बाजार की मां कोयल मर्याद भवानी माई के तार जुड़े हुए बताए जाते हैं। दार्शनिक राहुल सांकृत्यायन ने आजमगढ़ का इतिहास नामक पुस्तक में मांदी सिपाह स्थित मूर्तियों को मां कालरात्रि की शक्तिपीठ कहा है।
पूजन अर्चन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। लोगों ने प्राचीन मंदिरों को पर्यटन स्थल का दर्जा देकर सुंदरीकरण कराने की मांग की है।
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नवरात्रि पर इस मंदिर में ज्यादा ही गहमागहमी हो जाती है। इस मंदिर के साथ कई पौराणिक कहानियां जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि मुगल शासनकाल में जंगल में वहां मूर्तियां थी। औरगंजेब ने मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करवाया था। एक अन्य किवदंती के अनुसार जब चोर चोरी करने या माल को आपस में बांटने के लिए उसी जंगल से होकर आना जाना या ठहराव होता था तो वे मूर्तियां चोर-चोर कहकर शोर मचाने का काम करती थीं।
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तो चोरों ने गुस्से में आकर उन मूर्तियों को ही अपना निशाना बनाया। कटा हुआ हिस्सा उठाकर चोर ले जाने लगे तो कुछ ही दूर गए थे कि सभी अंधे हो गए। तभी उन्होंने मूर्ति को वहीं छोड़कर पूजन अर्चन करना शुरू कर दिया। ऐसा करने से उनकी आंखों में रौशनी वापस आ गई।
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बताया जाता है कि पहले वे मूर्तियां सोने की थी जो कटने के साथ ही सिर और धड़ सभी काले रंग के पत्थर में बदल गए। मूर्ति खंडों को जहां चोरों ने छोड़ा वहां वे मूर्ति खंड मां कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर के नाम से पूज्य हुई।
इस तरह रेयांव की ददोरिया माई और मांदी सिपाह बाजार की मां कोयल मर्याद भवानी माई के तार जुड़े हुए बताए जाते हैं। दार्शनिक राहुल सांकृत्यायन ने आजमगढ़ का इतिहास नामक पुस्तक में मांदी सिपाह स्थित मूर्तियों को मां कालरात्रि की शक्तिपीठ कहा है।
पूजन अर्चन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। लोगों ने प्राचीन मंदिरों को पर्यटन स्थल का दर्जा देकर सुंदरीकरण कराने की मांग की है।