लोहिया ने काशी में बनाया था समाजवाद का ‘समता घर’
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देश में समाजवाद लाने के चिंतन के साथ आदर्श राजनीति की धारा बहाने वाले डॉ. राममनोहर लोहिया ने काशी को राजनीतिक यात्राओं, संघर्षों का तो केंद्र बनाया ही था, चंदौली सीट से वह लोकसभा चुनाव भी लड़े थे। काशी की संकरी गलियों से उनका रिश्ता किशोरवय में तब ही जुड़ गया, जब बनारस विश्वविद्यालय में उन्होंने दाखिला लिया था। 1927 में बनारस विश्वविद्यालय से 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद वह इस शहर की गलियों, घाटों पर काफी वक्त बिताने लगे थे।
पुराने समाजवादी शतरूद्र प्रकाश उन दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह बताते हैं कि 1942 में अगस्त क्रांति के दौरान 17 अगस्त को चोलापुर थाने के पास ब्रिटिश पुलिस ने क्रांतिकारियों पर गोलियां चलाई थीं। उस घटना में आंदोलनकारी रामनरेश उपाध्याय ‘विद्यार्थी’ के अलावा पंचम, निरहू, चौथी और श्रीराम शहीद हो गए थे। कांग्रेस जिला सोशलिस्ट पार्टी के जिला मंत्री प्रभु नारायण ने श्रद्धांजलि सभा आयोजित की थी। उस सभा को लोहिया जी ने संबोधित किया था। साथ ही, थाने के पास ही शहीद स्मारक बनाने की पहल करते हुए पांच ईंटों से अपने हाथों बुनियाद भी रखी थी।
शतरूद्र बताते हैं कि 1956 में ही लोहिया की प्रेरणा से लोकबंधु राजनारायण ने बनारस में विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश से रोक हटाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया था। उस आंदोलन के बाद अंतत: पुजारियों-पंडों को झुकना पड़ा और मंदिर में दलितों का प्रवेश आरंभ हो गया। 1957 में चंदौली सीट से जब वह चुनाव लड़े, तब गांव-गांव भोंपू लगाकर सभाएं करते थे। लोहिया को हराने के लिए नेहरू और अन्य बड़े नेताओं ने ताकत लगा दी थी। अंतत: टीएन सिंह से वह पराजित हुए। तब लोहिया ने कहा था- ‘मैं किसी को क्या दे सकता हूं। मेरे पास न जाति है न धर्म न संपत्ति। मैं इतना ही कर सकता हूं कि देश का गरीब या आम आदमी मुझे अपना समझे...।’