फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Lohia was built in Kashi socialism 'home equity'

लोहिया ने काशी में बनाया था समाजवाद का ‘समता घर’

Tue, 24 Jan 2017 01:54 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 24 Jan 2017 01:54 AM IST
विज्ञापन
 Lohia was built in Kashi socialism 'home equity'
साथियों के साथ डॉ. लोहिया।
समाजवाद के प्रणेता डॉ. राममनोहर लोहिया देश के ऐसे इकलौते नेता थे जिनका अपना कोई घर नहीं था। करोड़ों गरीब ठेला, खोमचा, पटरी वालों के ही घर उनके अपने थे। फिर भी काशी के जगतगंज मुहल्ले में उन्होंने एक ‘समता घर’ बनाया था। उस घर की नींव उन्होंने तब आंदोलनकारियों, समाजवादी चिंतकों के ठहरने, रणनीतियां बनाने के लिए रखी थी। अविभाजित वाराणसी की चंदौली संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट  पर 1957 में चुनाव मैदान में उतरे लोहिया ने इसी धरती से गैरबराबरी के खात्मे के चिंतन की शुरुआत मणिकर्णिका महाश्मशान पर गरीब-अमीर की एक साथ चलती चिताओं को देख कर की थी। विश्वनाथ मंदिर में पहली बार ‘दलित प्रवेश’ आंदोलन चलाने की राजनारायण को प्रेरणा दी तो बेनियाबाग में गुलामी की प्रतीक विक्टोरिया की प्रतिमा तोड़ने की योजना भी उनके समता घर में ही बनाई गई थी। यहीं से उन्होंने ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ-पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा भी दिया। इस अंक में पढ़िए महान राजनेता लोहिया राजनीतिक आदर्शों के बारे में ...।  
विज्ञापन

 


 

देश में समाजवाद लाने के चिंतन के साथ आदर्श राजनीति की धारा बहाने वाले डॉ. राममनोहर लोहिया ने काशी को राजनीतिक यात्राओं, संघर्षों का तो केंद्र बनाया ही था, चंदौली सीट से वह लोकसभा चुनाव भी लड़े थे। काशी की संकरी गलियों से उनका रिश्ता किशोरवय में तब ही जुड़ गया, जब बनारस विश्वविद्यालय में उन्होंने दाखिला लिया था। 1927 में बनारस विश्वविद्यालय से 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद वह इस शहर की गलियों, घाटों पर काफी वक्त बिताने लगे थे। 

विज्ञापन

 

 

पुराने समाजवादी शतरूद्र प्रकाश उन दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह बताते हैं कि 1942 में अगस्त क्रांति के दौरान 17 अगस्त को चोलापुर थाने के पास ब्रिटिश पुलिस ने क्रांतिकारियों पर गोलियां चलाई थीं। उस घटना में आंदोलनकारी रामनरेश उपाध्याय ‘विद्यार्थी’ के अलावा पंचम, निरहू, चौथी और श्रीराम शहीद हो गए थे। कांग्रेस जिला सोशलिस्ट पार्टी के जिला मंत्री प्रभु नारायण ने श्रद्धांजलि सभा आयोजित की थी। उस सभा को लोहिया जी ने संबोधित किया था। साथ ही, थाने के पास ही शहीद स्मारक बनाने की पहल करते हुए पांच ईंटों से अपने हाथों बुनियाद भी रखी थी। 

विज्ञापन
विज्ञापन

 

 

शतरूद्र बताते हैं कि 1956 में ही लोहिया की प्रेरणा से लोकबंधु राजनारायण ने बनारस में विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश से रोक हटाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया था। उस आंदोलन के बाद अंतत: पुजारियों-पंडों को झुकना पड़ा और मंदिर में दलितों का प्रवेश आरंभ हो गया। 1957 में चंदौली सीट से जब वह चुनाव लड़े, तब गांव-गांव भोंपू लगाकर सभाएं करते थे। लोहिया को हराने के लिए नेहरू और अन्य बड़े नेताओं ने ताकत लगा दी थी। अंतत: टीएन सिंह से वह पराजित हुए। तब लोहिया ने कहा था- ‘मैं किसी को क्या दे सकता हूं। मेरे पास न जाति है न धर्म न संपत्ति। मैं इतना ही कर सकता हूं कि देश का गरीब या आम आदमी मुझे अपना समझे...।’

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed