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साहित्य, कला-संस्कृति इतिहास लेखन के स्रोत
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 22 Aug 2016 02:10 AM IST
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बीएचयू इतिहास विभाग की ओर से इतिहास दृष्टि, लेखन एवं स्रोत विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने इतिहास लेखन पर विस्तृत चर्चा की। रविवार को समापन समारोह में मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बाल मुकुंद पांडेय ने कहा कि साहित्य, लोक कला और संस्कृति इतिहास लेखन के मुख्य स्रोत हैं। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
सामाजिक विज्ञान संकाय में आयोजित संगोष्ठी में बाल मुकुंद ने कहा कि इतिहास के साथ कोई दुराग्रह या पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह पवित्रता एवं ज्ञान का प्रतीक है। कहा कि 1950 के बाद भारत में जो भी इतिहास लेखन किया गया है, उसे साम्राज्यवादी इतिहासकारों से कहीं ज्यादा तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। लेखन की दृष्टि पर बल देते हुए उन्होंने भारतीय दृष्टि एवं भारतीय चैतन्य के प्रकाश में भारत का इतिहास लिखे जाने पर बल दिया।
संकलन योजना के मार्गदर्शक मधु भाई कुलकर्णी ने भी इतिहास लेखन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला। राष्ट्रीय अध्यक्ष सतीश मित्तल एवं उपाध्यक्ष ईश्वर शरण विश्वकर्मा, डॉ. देवी प्रसाद सिंह ने स्थानीय कार्यकर्ताओं का अभिनंदन किया। संयोजिका प्रो. अरुणा सिन्हा ने अतिथियों के प्रति आभार जताया। कार्यक्रम में डॉ. जयलक्ष्मी कौल, डॉ. उर्जस्विता सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे।
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सामाजिक विज्ञान संकाय में आयोजित संगोष्ठी में बाल मुकुंद ने कहा कि इतिहास के साथ कोई दुराग्रह या पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह पवित्रता एवं ज्ञान का प्रतीक है। कहा कि 1950 के बाद भारत में जो भी इतिहास लेखन किया गया है, उसे साम्राज्यवादी इतिहासकारों से कहीं ज्यादा तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। लेखन की दृष्टि पर बल देते हुए उन्होंने भारतीय दृष्टि एवं भारतीय चैतन्य के प्रकाश में भारत का इतिहास लिखे जाने पर बल दिया।
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संकलन योजना के मार्गदर्शक मधु भाई कुलकर्णी ने भी इतिहास लेखन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला। राष्ट्रीय अध्यक्ष सतीश मित्तल एवं उपाध्यक्ष ईश्वर शरण विश्वकर्मा, डॉ. देवी प्रसाद सिंह ने स्थानीय कार्यकर्ताओं का अभिनंदन किया। संयोजिका प्रो. अरुणा सिन्हा ने अतिथियों के प्रति आभार जताया। कार्यक्रम में डॉ. जयलक्ष्मी कौल, डॉ. उर्जस्विता सिंह सहित कई लोग मौजूद रहे।
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