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कभी कमल पर प्रकट हुए थे कबीर, अब गंदगी का अंबार
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 06 Jul 2016 01:42 AM IST
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गगन मंडल से उतरे सद्गुरु सत्य कबीर/जलज माहिं पोढ़न किए दोऊ दीन के पीर...। यह दोहा संवत 1456 के उस दिन की याद दिलाता है, जब लहरतारा के तालाब में कमल पुष्प पर बालक रूप में संत कबीर प्रकट हुए थे। जाति-धर्म की खाई पाटकर दुनिया को मानवता के सूत्र में पिरोने का संदेश देने वाले कबीर से जुड़े जिस कुंड को आध्यात्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, वह सीवर और गंदगी से पाटकर बर्बाद कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक महत्व के तालाब का जीर्णोद्धार नहीं कराया गया तो आने वाले दिनों में काशी में एक अनमोल धरोहर अतीत का हिस्सा बन जाएगी।
लोक मान्यता के अनुसार 15वीं शताब्दी में एक बार नीरू-नीमा नामक जुलाहा दंपती मेहनत-मजदूरी कर घर लौट रहे थे। रास्ते में नीमा को प्यास लगी। पानी की तलाश में नीरू जब नीमा को लेकर लहरतारा तालाब के किनारे पहुंचे तब वहां कमल के फूल के बीच एक बालक दिखाई पड़ा। उस बालक को देख नि:संतान नीरू-नीमा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे लेकर वह घर आए और पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक संत कबीर के रूप में दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। कबीर के नाम पर उनकी परंपरा के अनुयायी तो शानो-शौकत और चमक-दमक के बीच वैभव भरी जिंदगी जी रहे हैं लेकिन उनके प्राकट्य के लिए याद किया जाने वाला तालाब बदहाल है।
इस तालाब में नगर निगम के मैनहोल की सीवर लाइन जोड़कर गिराई गई है। तीन नाले इसी तालाब में बहाए जा रहे हैं। आसपास की बस्तियों की गंदगी भी इसी में बहाई जाती है। हालांकि जनता जाग रही है। प्रबोधिनी फाउंडेशन, नारी शक्ति चेतना, साझा संस्कृति मंच समेत कई संगठनों के लोग अब इस कुंड की सफाई के लिए आगे आए हैं। कबीर जयंती से ही यहां जलकुंभी और सरपत काटने, साफ-सफाई का काम चल रहा है लेकिन करीब तीन एकड़ से अधिक रकबा वाले इस तालाब की सफाई के लिए जब तक प्रशासन के स्तर पर ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की जाएगी, इसका कायाकल्प नहीं हो सकेगा।
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लोक मान्यता के अनुसार 15वीं शताब्दी में एक बार नीरू-नीमा नामक जुलाहा दंपती मेहनत-मजदूरी कर घर लौट रहे थे। रास्ते में नीमा को प्यास लगी। पानी की तलाश में नीरू जब नीमा को लेकर लहरतारा तालाब के किनारे पहुंचे तब वहां कमल के फूल के बीच एक बालक दिखाई पड़ा। उस बालक को देख नि:संतान नीरू-नीमा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे लेकर वह घर आए और पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक संत कबीर के रूप में दुनिया में प्रसिद्ध हुआ। कबीर के नाम पर उनकी परंपरा के अनुयायी तो शानो-शौकत और चमक-दमक के बीच वैभव भरी जिंदगी जी रहे हैं लेकिन उनके प्राकट्य के लिए याद किया जाने वाला तालाब बदहाल है।
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इस तालाब में नगर निगम के मैनहोल की सीवर लाइन जोड़कर गिराई गई है। तीन नाले इसी तालाब में बहाए जा रहे हैं। आसपास की बस्तियों की गंदगी भी इसी में बहाई जाती है। हालांकि जनता जाग रही है। प्रबोधिनी फाउंडेशन, नारी शक्ति चेतना, साझा संस्कृति मंच समेत कई संगठनों के लोग अब इस कुंड की सफाई के लिए आगे आए हैं। कबीर जयंती से ही यहां जलकुंभी और सरपत काटने, साफ-सफाई का काम चल रहा है लेकिन करीब तीन एकड़ से अधिक रकबा वाले इस तालाब की सफाई के लिए जब तक प्रशासन के स्तर पर ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की जाएगी, इसका कायाकल्प नहीं हो सकेगा।
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