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वीरन भइया अइले अनवइयवा सवनवां में ना जईबे ननदी...

Mon, 25 Jul 2016 01:57 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 25 Jul 2016 01:57 AM IST
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kazri in varanasi
शैलबाला
पूर्वांचल के गांवों में दादी, नानी अपनी लंबी उम्र के आंकड़े जिंदगी भर के सावन जोड़कर गिनाती हैं। कोई पूछता है तो कहती हैं कि- लगत हौ कि सत्तर-बहत्तर सावन देख लेले होइब...। यह कहना है गायिका शैलबाला का। वह कहती हैं कि सावन स्नेह, लगाव जताने का सबसे बड़ा अवसर लेकर आता है। भारतीय नारी के जीवन में सावन से बढ़कर कोई महीना नहीं होता।
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शैलबाला कहती हैं कि सावन में सजने-संवरने से लेकर नैहर से सासुर तक की यादें, प्यार कजरी में निहित हैं। महिलाओं के लिए तो जीवन के असल रंग चढ़ने की शुरुआत सावन से ही होती है। सावन लगते ही भाई के दीर्घायु जीवन की कामना शुरू हो जाती है। वह जरई बोने लगती है। सावन में भाई तो भादों में पति के लिए तीज आ जाती है। पति पास होता है तो साज-शृंगार कर उसे मनाने, लुभाने की कोशिश करती हैं। पति नहीं होता तो उसे बुलाने के लिए चिट्ठियां लिखने लग जाती हैं। वह कजरी गुनगुनाती हैं- वीरन भइया अइले अनवइवा सवनवां में ना जइबे ननदी...। वह बताती हैं कि भैया विदा कराने आ रहे होते हैं और खबर आती है तब वह अपनी ननद से कहती है कि सावन में पति को छोड़ नैहर जाने का मेरा मन नहीं कर रहा है।
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इस महीने कजरी में ननद-भौजाई के संवाद खूब मिलते हैं। एक नई नवेली दुल्हन अपनी ननद से पूछती है कि तुम्हारा भाई किस रंग का है? वह सवाल-जवाब की कजरी गाती हैं- कौने रंग मुंगवा कवन रंग मोतिया कवन रंग ननदी तोर वीरना...। जवाब आता है-लाले रंग मुंगवा सफेद रंग मोतिया सांवरे रंग भउजी मोर वीरना....। इसी तरह सावन की रात  से लेकर भिनसार तक का वर्णन कजरी में मिलता है। हरी-हरी बेला फुलै आधी रात चमेला भिनुसहरा रे हरी...।
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कजरी में ननद को भौजाई चेताते हुए भी नजर आती है- सुंदर समझ बूझ के चला नाहीं पछतइबू सावन में... धोखे से गिर जइबू धक्का खइबू सावन में...। शैलबाला बताती हैं कि सावन में गोदना नैहर और सासुर दोनों के सुखी-संपन्न जीवन के लिए स्त्री अपने शरीर पर गोदवाती थीं। भगवान से प्रार्थना करती थीं कि मैं कष्ट सह लूंगी लेकिन मेरे घर-परिवार के लोग सुखी रहें। इस पर भी कजरी गाई जाती है-आव हो आवा नइकी बहुरिया गोदनवा गोदाइला, सवनवां बीतल जाला ...।  
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