पीएम मोदी के आह्वान पर काशी के काष्ठ शिल्पी बनाएंगे लकड़ी के खिलौने, दुनिया भर में छोड़ेंगे अपनी छाप
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पिछले दिनों टॉय फेयर के शुभारंभ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों के विकास को बढ़ावा देने वाले खिलौने बनाने का आह्वान किया था। इस पर काशी के हस्तशिल्पियों ने अमल करते हुए लकड़ी के आकर्षक खिलौने बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। खास बात यह है कि यह खिलौने हिंसक मनोवृत्ति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुसार बच्चों के मस्तिष्क विकास को बढ़ावा देने वाले होंगे।
मनोचिकित्सकों का भी कहना है कि खिलौने बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत प्रभाव डालते हैं। बच्चों को शुरू में जो खिलौने खेलने के लिए मिलते हैं, उनके मन में उसी तरह के भाव भी उत्पन्न होते हैं। बच्चे खिलौने देखकर ही खुद को उसी तरह ढालने लगते हैं। इस समय बाजार में बहुत तरह के खिलौने मौजूद हैं। जिनमें शिक्षा, मनोरंजन से लेकर मारधाड़ करने वाले खिलौने खूब बिक रहे हैं।
मनोचिकित्सकों के अनुसार बच्चों को हमेशा से आकर्षक खिलौने पसंद आते हैं। जिससे खिलौना निर्माताओं की भी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने लाभ के साथ यह भी देखें कि जो खिलौने तैयार हो रहे हैं, उसका बच्चों के मन मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कभी ऐसे खिलौने न बनाएं, जिससे बच्चों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़े। जिस तरह चीन के बने खिलौने होते हैं।
बच्चों को लुभा रहे हैं टॉम एंड जैरी, छोटे भीम के गुल्लक
कश्मीरीगंज के शिल्पी राज कुंदेर ने बताया कि इस समय बच्चे मोबाइल प्रेमी हो गए हैं। वीडियो में वह टॉम एंड जैरी, छोटा भीम सहित कई ऐसे कार्टून देखते हैं। उसी तरह ही उन्हें खिलौने भी चाहिए होते हैं। यह देखते ही काशी के काष्ठ शिल्पी टॉम एंड जैरी के पेन स्टैंड, ज्योमेट्री बाक्स, गुल्लक सहित कई आकर्षक लकड़ी के खिलौने बना रहे हैं। इसके अलावा मोटर कार, आटो, ट्रक, रिक्शा और दाना चुगती हैंगिंग चिड़ियां इत्यादि भी निर्मित किए जा रहे हैं। अब इनको और आकर्षक बनाने का प्रयास किया जाएगा।
बच्चों की अलग-अलग मनोवृत्तियां होती हैं। कुछ बच्चे इलेक्ट्रिक खिलौनों को पसंद करते हैं तो कोई शिक्षा देने वाले खिलौने को पसंद करते हैं। आजकल मारधाड़ व तोड़फोड़ वाले गेम भी चलन में है। यह देखने के बाद बच्चों के अंदर इस तरह की प्रवृत्ति भी उत्पन्न होती है। ऐसे खिलौने न दें। कोशिश हो कि बच्चों को सकारात्मक संदेश देने वाले खिलौने का अधिक निर्माण हो। -डॉ. रविंद्र कुशवाहा, मनोचिकित्सक, मंडलीय अस्पताल, कबीरचौरा