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विद्यापीठ की वृद्धि हो, राक्षसी सल्तनत को मिटाने में हिस्सा लें

Wed, 22 Jan 2020 01:54 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jan 2020 01:54 AM IST
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kashi vidyapeeth
वाराणसी। जितने विद्यालय सरकार के असर में हैं वहां विद्या नहीं लेनी चाहिए। जहां गोरों की ध्वजा फहराती है, वहां विद्यादान लेना पाप है। असहयोग हमारा एकमात्र शस्त्र है और दूसरा कर्तव्य मातृभाषा को विकसित करना है। मेरी प्रार्थना है कि प्रतिदिन विद्यापीठ की वृद्धि हो और राक्षसी सल्तनत को मिटाने या इसे दुरुस्त करने में हिस्सा लें। उक्त कथन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी पांचवीं काशी यात्रा पर कहे थे। बापू ने 9 फरवरी 1921 को टाउनहाल में जनसभा की। इस दौरान उक्त कथनों को कहते हुए विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान किया। दूसरे दिन 10 फरवरी 1921 को काशी विद्यापीठ की नींव रखी।
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बता दें कि बापू ने असहयोग को बढ़ाने के लिए ही विद्यापीठ की स्थापना की। दरअसल, राष्ट्र्रपिता के काशी में 11 बार काशी की यात्रा की थी। जब-जब उनके कदम इस धरा पर पड़े, हर बार कुछ न कुछ महत्वपूर्ण हुआ। 117 साल बीतने के बाद भी आज सब कुछ प्रासंगिक है।
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छठवीं यात्रा पर वे 17 अक्तूबर 1925 को काशी विद्यापीठ आए। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों से रचनात्मक कार्यों से जुड़ने का आह्वान किया था। बापू ने कहा था कि रचनात्मक कार्यों में चरखे का स्थान प्रथम है। देश को दरिद्रता से मुक्ति दिलाने के लिए चरखे को छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह चरखा ही भारत के स्वावलंबन का प्रतीक है।
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सातवीं यात्रा में बापू जनवरी 1927 में बीएचयू आए तो छात्रों से खद्दर खरीदने का आह्वान किया। सितंबर 1926 में बापू की आठवीं काशीयात्रा में असहायों की सेवा पर संवाद हुआ। विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में छात्रों की संख्या कम थी, लेकिन बापू ने उनकी हिम्मत बढ़ाई। बापू की नौवीं यात्रा यादगार रही। उन्होंने 27 जुलाई से दो अगस्त तक काशी विद्यापीठ के कक्ष में सात दिनों तक प्रवास किया। महात्मा गांधी की दसवीं यात्रा ऐतिहासिक रही। अक्तूबर 1936 में इस यात्रा में उन्होंने काशी विद्यापीठ परिसर के बगल में अखंड भारत की संकल्पना का प्रतीक भारत माता मंदिर का उद्घाटन किया। उनके साथ सरदार पटेल और खान अब्दुल गफ्फार खां भी थे।
डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी, निदेशक, गांधी अध्ययनपीठ, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ
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