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Masan Ki Holi: काशी विद्वत परिषद ने मसाने की होली का किया विरोध, कहा- श्मशान में त्योहारों की कोई जगह नहीं

Mon, 23 Feb 2026 12:01 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, पीटीआई।
अमर उजाला नेटवर्क, पीटीआई। Published by: प्रगति चंद Updated Mon, 23 Feb 2026 12:01 PM IST
सार

Varanasi News: काशी विद्वत परिषद ने काशी के श्मशान घाटों पर मसाने की होली खेलने की परंपरा का विरोध किया। कहा कि मसाने की होली शास्त्रों की परंपराओं के अनुसार नहीं है। 

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Kashi Vidvat Parishad opposed Holi in cremation grounds saying it's not  place for festivals in Varanasi
Masan holi - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी विद्वत परिषद ने वाराणसी शहर के महाश्मशान घाट मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर मसाने की होली खेलने की परंपरा का विरोध किया है। दावा किया है कि यह परंपरा शास्त्रों के अनुसार नहीं है। 

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ये है परंपरा
मसाने की होली या भस्म होली एक परंपरा है जो रंगभरी एकादशी के अगले दिन खेली जाती है, जो होली की शुरुआत का प्रतीक है। यह परंपरा वाराणसी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर खेली जाती है। जहां साधु और भक्त जलती हुई चिताओं की राख और गुलाल से होली खेलते हैं।
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मसान शब्द का मतलब श्मशान घाट होता है और यह जीवन और मृत्यु के चक्र और शिव के त्याग का प्रतीक है। भक्त राख के इस्तेमाल को मौत और वैराग्य की याद दिलाने वाला बताते हैं।
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परिषद के सदस्य विनय पांडेय ने दावा किया कि महाश्मशान में होली मनाना शास्त्रों की परंपराओं के अनुसार नहीं है। कुछ लोगों ने इसे पुराना रिवाज बताकर हाल के कुछ वर्षों में ही यह आयोजन शुरू किया है। पांडेय ने दावा किया श्मशान से एक खास पवित्रता जुड़ी होती है। यह जश्न मनाने की जगह नहीं है। युवा अब वहां स्थापित परंपराओं को तोड़ रहे हैं।

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सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने दावा किया कि यह रिवाज 2014 में साधुओं को ठंडाई परोसने के बहाने शुरू हुआ था और बाद में इसे सदियों पुरानी परंपरा के तौर पर पेश किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि मसाने की होली के नाम पर लोग नशा करते हैं और गलत व्यवहार करते हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्र बिना वजह श्मशान जाने से मना करते हैं और ऐसे कामों से रीति-रिवाजों में गंदगी फैलती है।

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पंडित छन्नूलाल मिश्रा से जुड़े पॉपुलर मसाने की होली गाने का जिक्र करते हुए अजय शर्मा ने कहा कि मशहूर हिंदुस्तानी क्लासिकल सिंगर ने साफ किया था कि उनका गाना भक्ति से जुड़ा था, न कि इस रिवाज का सपोर्ट करने के लिए था। यह आरोप लगाते हुए कि यह आयोजन शहर की क्षवि खराब करने की कोशिश है। मांग की कि इस आयोजन को रोका जाए।

हालांकि आयोजन का संचालन करने वाले गुलशन कपूर ने उत्सव का बचाव करते हुए कहा कि आलोचकों को स्थानीय परंपरा और धर्मग्रंथों की जानकारी नहीं है। कपूर ने दावा किया कि धार्मिक ग्रंथों में अंतिम संस्कार की राख से होली खेलने का जिक्र मिलता है। मुगल राज में यह रिवाज कम हो गया था, लेकिन बाद में इसे फिर से शुरू कर दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग उत्सव से जुड़े दान पाने में नाकाम रहने के बाद पैसे के फायदे के लिए आयोजन का विरोध कर रहे थे।

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