काशी की अनोखी गणेश पूजा: बाजीराव पेशवा परिवार ने 220 साल पहले शुरू की थी, 15 बार ओम के उच्चारण के साथ पूजन
वाराणसी में बाजीराव पेशवा परिवार की ओर से करीब 220 साल पहले शुरू की गई गणेश पूजा की परंपरा आज भी जारी है। इस बार बाहुबली थीम पर बने पंडाल में लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति विराजेगी। 10 दिनों तक षोडशोपचार पूजन के साथ विविध धार्मिक अनुष्ठान होंगे। आयोजन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं और श्रद्धालुओं में उत्साह है।
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काशी में सबसे पुरानी बाजीराव पेशवा परिवार की गणेश पूजा है, जो सन 1807 से शुरू है। उनके प्रपौत्र अमृत राव पेशवा ने इसे शुरू किया था। रामघाट पर उन्होंने अमृत विनायक मूंगा गणेश मंदिर की स्थापना की। गणेश मंदिर एवं अन्नपूर्णा क्षेत्र एंडामेंट ट्रस्ट के प्रबंधक पं. किशन राम डोहकर ने बताया कि पेशवा परिवार के पुष्कर पेशवा पूजा में शामिल होते हैं।
चतुर्भुज मूंगे के रंग की संगमरमर की प्रतिमा है, जो मूंगे के गणेश के नाम से प्रसिद्ध है। कमल की दो पत्तियों के ऊपर पालथी लगाए बाईं ओर सूंड और दाईं ओर का दांत है। ऐसे एकदंत भगवान श्री अमृत विनायक, जिनके सिर पर मुकुट विराजमान है। महाराष्ट्रीय रेशमी धोती एवं दुपट्टा धारण किए हुए हैं।
शिव की नगरी में सोमवार से 10 दिनों तक गणपति बप्पा का महिमा गान शुरू हो जाएगा। कलश स्थापना के साथ गणेशोत्सव शुरू हो जाएगा। पूजा पंडालों में सुबह गाजे-बाजे के साथ गणेश जी विराजेंगे। मराठी विधि से उनका पूजन-अर्चन होगा। गणपति बप्पा की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद 15 बार ओम के उच्चारण के साथ संस्कार होगा। दुर्वा से गणेश जी की आंखें खोलकर षोडशोपचार पूजन होगा। 50 से अधिक पूजा पंडालों में पूजा होगी। विविध प्रतियोगिताएं होंगी। रविवार को पंडालों को सजाने-संवारने और कुछ में प्रतिमाएं रखी गईं।
श्रीकाशी मराठा गणेश उत्सव समिति का पांच दिवसीय श्रीगणेश उत्सव ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी में मनाया जाएगा। यहां मुंबई के लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति स्थापित कर मराठी पद्धति से पूजा होगी। छह फीट की प्रतिमा तथा पंडाल बाहुबली थीम पर बन रहा है। 18 सितंबर को विविध अनुष्ठान होंगे और भव्य शोभायात्रा निकालकर प्रतिमा का विसर्जन होगा। नूतन बालक गणेशोत्सव समाज सेवा मंडल का सात दिवसीय गणेशोत्सव गणेश भवन (गणेश दीक्षित लेन, चौखंभा) में मनाया जाएगा।
समिति के प्रवीण वसंत पटवर्धन ने बताया कि मेयर अशोक तिवारी उद्घाटन करेंगे। दुर्वा सहस्रनामार्चन, वसंत पूजा, नारदीय हरिकीर्तन, विद्वत सत्कार, पद्यगान, नृत्य प्रतियोगिता, भजन संध्या, हल्दी-रोरी, संगीत सम्मेलन, महानैवेद्य अर्पण होगा। अहमदाबाद के कलाकारों का ‘ओह माय फ्रॉड’ का प्रस्तुति होगी। अंतिम दिन शोभायात्रा निकाली जाएगी। श्री काशी गणेशोत्सव कमेटी का सात दिवसीय गणेशोत्सव ब्रह्माघाट पर आंग्रे का बाड़ा में मनाया जाएगा। विविध प्रतियोगिताएं होंगी।
बच्चे मराठी व हिंदी में पद्यगान करेंगे। संगीत सम्मेलन, हरियाली शृंगार होगा। श्री गणेशोत्सव सेवा समिति की ओर से राधा कृष्ण मंदिर, दशाश्वमेध में 12 दिवसीय गणेशोत्सव में सिद्धि विनायक जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा होगी। पहली बार सिद्धि विनायक की पूजा होगी। शारदा भवन, अगस्तकुंडा में गणेशोत्सव सोमवार से शुरू होगा। इस दौरान पूजन-अर्चन के साथ साहित्य, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष विषयों में शलाका परीक्षा, व्याख्यान प्रतियोगिता, सम्मान समारोह, न्याय, व्याकरण व वेदांत विषय पर शास्त्रार्थ व विद्वत सभा होगी।
18 सितंबर को शोभायात्रा निकाली जाएगी। वहीं, पेशवा परिवार का रामघाट स्थित अमृत विनायक मूंगा गणेश मंदिर में शुरू तीन दिवसीय गणेश पूजा का समापन सोमवार को होगा। रविवार को पूजा में पेशवा परिवार के पुष्कर पेशवा शामिल हुए। अंतिम दिन भजन संध्या में दिल्ली की वृंदा गुजराती का गायन व डॉ. संजय वर्मा का गिटार वादन होगा।
महाराष्ट्र के बाद काशी में शुरू हुई थी आंग्रे के बाड़े की सार्वजनिक गणेश पूजा
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की शुरुआत की। इसके बाद काशी में इसकी आवाज गूंजी और तिलक से प्रेरित होकर कुछ युवाओं ने यहां भी करीब 350 साल पुराने आंग्रे के बाड़े में देश का दूसरा सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू किया। 129 वर्षों से गणेशोत्सव की पूजा हो रही है।
श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी के बैनर तले मराठी समाज के पांच लोगों ने इसकी स्थापना की। अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। कुछ साल बाद ही उनकी प्रेरणा से काशी में भी यह शुरू हो गया।
कमेटी के अध्यक्ष सुनील चितले ने बताया कि काशी महाराष्ट्र स्कूल बोर्ड ने 1898 में काशी में ब्रह्मा घाट स्थित सरदार आंग्रे के बाड़े में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा की शुरुआत की। फिर राजाराम मेहेंदव्ठे, काशीनाथ रामचंद्र भागवत, राजाराम गणेश टोककर, गणेश चिमणा थत्थे और रामचंद्र नारायण गंगाजव्ठी ने मिलकर श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी की स्थापना की। उन्होंने बताया कि आंग्रे का बाड़ा महाराजा शिवाजी के खासदार एक सरदार का था, जिसे कमेटी ने खरीद लिया।
इसके बाद इसी में गणेशोत्सव शुरू हुआ। इस उत्सव में 1920 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, 1923 में पं. मदनमोहन मालवीय, 1925 में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, करपात्री जी महाराज, पं. शिव प्रसाद गुप्ता, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, बिहार के राज्यपाल रहे माधवहरि अणे, भैयाजी बनारसी आदि शामिल हो चुके हैं। इस उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी काशी के बड़े कलाकार शामिल हो चुके हैं।
98 साल से अगस्तकुंडा पर पूजा
98 साल पहले शारदा भवन, अगस्त्यकुंडा में गणेशोत्सव शुरू हुआ। पाठक परिवार इस पूजा को करवाता है। यहां की प्रतिमा को गंगा में विसर्जन नहीं किया जाता है। बड़े पात्र में गंगाजल भरकर प्रतिमा विसर्जित की जाती है। पाठक परिवार के पं. यादवराव पाठक बताते हैं कि 1929 में संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान पं. गौरीनाथ पाठक ने इस पूजा की शुरुआत की थी। भगवान गणेश का जन्म शास्त्रीय परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। 21 तरह की वनस्पतियों से पूजा की जाती है।
96 वर्ष से जंगमबाड़ी, 64 वर्ष से जगतगंज में उत्सव
जंगमबाड़ी मठ का गणेश उत्सव सन 1930 में तत्कालीन 82वें जगद्गुरु के सानिध्य में शुरू हुआ। कान्यकुब्ज वैश्य हलवाई समिति द्वारा 1962 में गणेशोत्सव का प्रारंभ हुआ। जगतगंज, श्रीराम तारक आंध्र आश्रम मानसरोवर में गणेश नवरात्र की पूजा 1987 में, श्री गणेश उत्सव सेवा समिति की स्थापना 2001 में और श्रीराम मंदिर गणेशोत्सव मंडल बांसफाटक की स्थापना 2003 में हुई।
ढुंढिराज गणेश के दर्शन पर मिलता है बाबा का आशीर्वाद
वाराणसी। काशी में गणेशोत्सव सोमवार से शुरू होगा। पंडालों में दर्शन-पूजन होगा। 10 दिनों तक सार्वजनिक गणेशोत्सव का उल्लास छाया रहेगा। वहीं, काशी के विघ्नहर्ता गणेश जी के छप्पन विनायक भी विराजमान हैं, जो काशीवासियों के विघ्न हरने के साथ ही उन पर सुख-समृद्धि की वर्षा करते हैं। स्कंद पुराण के काशी खंड में 56 विनायक मंदिरों का वर्णन है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में सात मंडलों और आठ दिशाओं में स्थित हैं और देवाधिदेव की नगरी की रक्षा करते हैं। विनायकों के मुख्य नायक ढुंढिराज गणेश हैं, जो श्रीकाशी विश्वनाथ के करीब विराजते हैं।
अष्टभुजा व मणि रूप में हैं चिंतामणि गणेश
विनायकों में एक चिंतामणि गणेश मंदिर सोनारपुरा में स्थित है। यहां गणेश जी सपरिवार विराजमान हैं। मंदिर के महंत पं. चल्ला सुब्बाराव शास्त्री ने बताया कि यहां गणेश जी लंबोदर विनायक के रूप में हैं। उनके साथ शुभ-लाभ, रिद्धि-सिद्धि भी हैं। अष्टभुजा, त्रिनेत्र, एकदंत और मणि रूप में हैं। बताया कि यहां जो भी अपनी चिंता लेकर आता है और दर्शन-पूजन करता है, उसका कष्ट दूर हो जाता है।
दुर्ग विनायक के 41 दिनों तक दर्शन का विशेष फल
56 विनायकों में एक दुर्गाकुंड स्थित दुर्गा मंदिर के पीछे दुर्ग विनायक मंदिर है। यहां दर्शन-पूजन के लिए भीड़ होती है। काशी खंड में दुर्ग विनायक का वर्णन है। भगवान गणेश को दूर्वा अति प्रिय है, इसे चढ़ाने से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। मंदिर के व्यवस्थापक तारकेश्वर दुबे ने बताया कि पूजा करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 41 दिनों तक लगातार दर्शन-पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
दरोगा ने बनवाया था शालकटंकटा गणेश मंदिर
मंडुवाडीह थाने के पीछे मांडवी तालाब के पास शालकटंकटा विनायक विराजमान हैं, जिन्हें शालकंद विनायक भी कहा जाता है। ये काशी के 56 विनायकों में एक हैं। मंदिर के पुजारी राजकिशोर पांडेय ने बताया कि बरगद के पेड़ के नीचे उनकी प्रतिमा थी। 45 साल पहले मंडुवाडीह थाने के दरोगा माताचरण पांडेय ने मंदिर का निर्माण करवाया। गणेश जी के दर्शन और पूजन से भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट और बाधाएं दूर हो जाते हैं।
काशी के आध्यात्मिक द्वारपाल हैं ढुंढीराज
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास ढुंढीराज गणेश मंदिर है। वह विनायकों में सबसे प्रमुख और प्रथम पूज्य माने जाते हैं। मान्यता है कि इनके दर्शन के बाद ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन का फल मिलता है। ढुंढीराज गणेश जी को काशी नगरी का आध्यात्मिक द्वारपाल भी कहा जाता है। यहां भगवान गणेश जी की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है। इनके दर्शन से भक्तों के कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं। उनकी कोई कीमती खोई हुई वस्तु वापस मिल जाती है।