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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Kashi is older history itself sentiment drives world of Gen Z born just 25 years ago unique history

UP: काशी इतिहास से पुराना है, यही बोलकर चल रही 25 साल पहले जन्मी जेन जी की दुनिया; पढ़ें अनोखा इतिहास

Sun, 10 May 2026 01:53 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 10 May 2026 01:53 PM IST
सार

Varanasi News: बीएचयू के पूर्व विशेष कार्याधिकारी डॉ. विश्वनाथ पांडेय ने कहा कि काशी इतिहास से भी पुरानी सांस्कृतिक नगरी है, लेकिन नई पीढ़ी इसकी गहराई को समझे बिना आगे बढ़ रही है। उन्होंने याद किया कि तीन दशक पहले बनारस सांप्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध था। शहर में तनाव की खबर पर तत्कालीन कुलपति तक धरने पर बैठ गए थे।

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Kashi is older history itself sentiment drives world of Gen Z born just 25 years ago unique history
डॉ. विश्वनाथ पांडेय। - फोटो : संवाद

विस्तार

Varanasi News: काशी के पुरुषार्थ की एक बड़ी कड़ी काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। महामना मदन मोहन मालवीय का कथन था कि सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, विद्या, देशभक्ति और आत्मत्याग से विद्यार्थियों को समाज में सम्मान के योग्य बनना चाहिए। मगर बीते ढाई दशक से विश्वविद्यालयों में प्रवेश और परीक्षा पर ही अधिक जोर रह गया है। विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया उपेक्षित होती चली गई। विश्वविद्यालय प्रकाशन बंद पड़ा है, मेमोरियल लेक्चर अब किसी को याद नहीं।

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संघ और बीएचयू कोर्ट भी अस्तित्वहीन होते जा रहे हैं। जिसने 25 साल पहले का कैंपस देखा है, उसके लिए वह समय किसी स्वर्ण युग से कम नहीं था। अब अधिकांश लोग जस के तस व्यवस्था में ही व्यस्त हैं। आवाज उठाने वाला भी व्यक्तिगत लाभ तलाशने लगता है। 
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जो समर्थ है, वह संपत्ति वृद्धि और आत्मश्लाघा में डूबा दिखाई देता है। आज की कुछ जेन जी का काम केवल इस बात से चल जा रहा है कि “काशी इतिहास से पुराना है।” जबकि 25 साल पहले तक दुनिया भर के विद्वानों ने काशी की विद्वता, धर्म, इतिहास और भाव पर सैकड़ों पुस्तकें लिखीं। उन्हीं लोगों ने इस शहर की बौद्धिक और सांस्कृतिक धारा को जीवित रखा। मगर अब वे विमर्श कहीं गुम होते दिख रहे हैं।

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इस शहर पर बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन जिस बात पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई, वह है काशी की सांप्रदायिक शून्यता। यह परंपरा काफी हद तक आज भी सुरक्षित है। तीन दशक पहले जब शहर में तनाव का माहौल बना था, तब काशी का बौद्धिक वर्ग सड़कों पर उतर आया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर हजारों प्रोफेसर और छात्र मालवीय भवन से टाउनहॉल तक पदयात्रा करते हुए धरने पर बैठे थे और तनाव को शहर से बाहर कर दिया था। 

वह सामाजिक चेतना और एकजुटता आज बहुत याद आती है। काशी के पुराने वाशिंदे शहर की बदलती परंपराओं, रहन-सहन और दिनचर्या को लेकर मुखर जरूर हैं, लेकिन यह भी सच है कि भागती तकनीक, बढ़ता अर्थतंत्र और बदलता परिवेश कुछ नैतिक और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावित करेगा। चुनौती यही है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। - डॉ. विश्वनाथ पांडेय, पूर्व विशेष कार्याधिकारी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

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